आजादी की दीवानी दुर्गा भाभी

समीक्षा — अनिल गोयल

भारतवर्ष को अंग्रेजों के चंगुल से छुड़ाने के लिये एक लम्बा संघर्ष चला था. इस में अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी में बंगाल में हुए सन्यासियों के विद्रोह से ले कर 1947 तक के सभी सशस्त्र और अन्य संघर्ष सम्मिलित हैं. लगभग पौने दो सौ वर्ष तक चले उस लम्बे संघर्ष की कुछ घटनाओं के बारे में कहानी, उपन्यास इत्यादि लिखे गये. लेकिन इन का अधिकतर इतिहास छिपा ही रह गया. सन 2022 में स्वतन्त्रता के पिचहत्तर वर्ष पूरे होने के अवसर पर, ऐसे अनजाने, भुला दिये गये समरांगण-वीरों के बारे में जानकारी को साधारण जन तक पहुँचाने के लिये अनगिनत कार्यक्रम आयोजित किये गये. ऐसे ही प्रयासों में से एक रहा लेखक-निर्देशक अक्षयवर नाथ श्रीवास्तव का लिखा और मंचित किया गया नाटक ‘आजादी की दीवानी दुर्गा भाभी’.

दुर्गा भाभी के नाम से हम में से कौन परिचित नहीं है? भगत सिंह और चन्द्रशेखर आजाद इत्यादि के साथी रहे भगवती चरण वोहरा की पत्नी थीं दुर्गा भाभी या दुर्गावती देवी. एक रोचक परन्तु सत्य तथ्य है, कि इतने सारे क्रान्तिकारियों में से केवल भगवती चरण वोहरा ही विवाहित थे… शेष लगभग सभी अविवाहित ही थे! इतने सारे पिस्तौल और बम चलाने वाले उग्र क्रान्तिकारियों के बीच यह एक महिला कैसे रहती होगी, और वह भी उन परिस्थितियों में, जहाँ इन लोगों के काम की गोपनीयता के चलते उन्हें अपने घर के आसपास के लोगों के साथ सम्बन्ध बनाने की सुविधा तो नहीं ही रही होगी, यह अपने में एक रोचक कल्पना ही है, जिस पर किसी लेखन ने कुछ नहीं लिखा है!

लेकिन दुर्गा भाभी के जीवन के इस पक्ष का रहस्य सम्भवतः उन की पारिवारिक पृष्ठभूमि में छिपा होगा! प्रयागराज (इलाहाबाद) के शहजादपुर गाँव में पण्डित बांकेबिहारी के यहाँ जन्मी दुर्गावती के पिता कलैक्ट्रेट में नजीर थे, और दादा थानेदार थे, अतः पुलिस और प्रशासन के प्रति साधारण जन के मन में रहने वाला भय दुर्गा के मन में नहीं रहा होगा.

इन सब क्रान्तिकारियों में से भगवती चरण सब से अधिक आयु के थे. सत्ताईस वर्ष की आयु में उन की मृत्यु हो गई थी. दुर्गावती उस समय पर कुल बाईस वर्ष की अवस्था की थीं. इतनी कम आयु में विधवा हो गई दुर्गा भाभी ने अपना बाकी का जीवन भी स्वतन्त्रता के संघर्ष में भाग लेते हुए ही गुजारा. लेकिन वह जीवन कैसा रहा होगा, जिस में न सिर्फ उन के अपने पति, बल्कि एक-एक कर के उन के लगभग सभी प्रमुख साथी भी मारे गये थे? भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी हुई, चन्द्रशेखर अंग्रेजों से लड़ते हुए मारे गये, और भी सभी साथी या तो मारे गये, या फिर जेलों में गये या फिर भूमिगत हो कर रहते रहे. और यही नहीं, एक एकाकी जीवन जीने को मजबूर हुई दुर्गा भाभी और उन के बच रहे कुछ साथियों में से अधिकतर को स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद भी कोई सम्मान या पहचान भारत की सरकार ने नहीं दिया. ऐसे विकट जीवट वाली दुर्गा भाभी अकेली ही रहती रहीं, और दिल्ली के निकट गाजियाबाद में एक स्कूल चलाती रहीं, जहाँ अक्टूबर १९९९ में उन की मृत्यु हुई.

ऐसी साहसी महिला के जीवन पर नाटक लिख कर उसे मंचित करने का अनुकरणीय काम किया अक्षयवर नाथ श्रीवास्तव ने. जून २०२३ को इस नाटक का प्रदर्शन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के अभिमंच में देखने को मिला.

दुर्गावती के रूप में तनु पाल और भगतसिंह की भूमिका में शिवम सिंघल ने अपने अभिनय से बहुत अधिक प्रभावित किया. चन्द्रशेखर आजाद की भूमिका में आभास सिंह तथा अन्य भी सभी कलाकारों ने अपने दक्ष अभिनय से प्रभावित किया. लेकिन मुझे लगता है कि पुलिस इंस्पैक्टर और सी.आई.डी. इंस्पैक्टर के चरित्रों को इतना हास्यास्पद बना देने से नाटक की गम्भीरता प्रभावित हुई. ब्रिटिश राज की भारतीय पुलिस के नृशंस कृत्यों को कौन नहीं जानता… किस प्रकार से अपने अत्याचारों से उन्होंने क्रान्तिकारियों को परेशान किया था, यह हम सब को पता है. उन चरित्रों को मजाहिया बना देने से दर्शकों के मन पर होने वाला उन अत्याचारों का अनुभव कमजोर पड़ जाता है.

मंच परिकल्पना में भी कुछ परिवर्तन की आवश्यकता अनुभव होती है. मंच के बाएँ हाथ पर बनाये गये विशालकाय रेलवे स्टेशन का कोई विशेष प्रयोग नहीं हुआ, जब कि उस ने पूरे समय मंच के बड़े हिस्से को घेरे रखा. और जो पूरे नाटक में गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र था, भगवतीचरण वोहरा का घर, जिसे बाद में कलकत्ता के घर और अन्य स्थानों के रूप में भी प्रयोग किया गया, वह दबा-दबा सा रहा, जिससे पूरा प्ले-एरिया या अभिनय के लिये उपलब्ध स्थान एक कोने में सीमित हो कर रह गया. मंच पर गतिविधियों के विभिन्न स्थलों के बीच एक अनुपात बनाना पड़ता है, जिस का ध्यान न रखने के कारण यह नाटक उभर कर आ ही नहीं पाया. ऐसी ही समस्या प्रकाश-संयोजन के साथ भी रही, जिस में मंच का प्रकाश लगातार दर्शकों की आँखों पर पड़ कर दृश्यों की दृश्यव्यता को प्रभावित करता रहा. एल.ई.डी. पर्दे के आगे रखी एक लाईट तो पूरे नाटक में दर्शकों की आँखों में चुभती रही. आज के समय में मंच-आलोकन डिजाइनर का क्रीड़ा-स्थल अधिक बन गया है, नाटक के कथानक को दर्शकों तक पहुँचाने में सहायक होने का साधन कम रह गया है. नाटक की दर्शकों तक सम्प्रेषणीयता में बाधक बन रही इस प्रवृत्ति पर गम्भीरता से विचार करना होगा.

हरी सिंह खोलिया रूप-सज्जा के माहिर माने जाते हैं, और इस नाटक में की गई रूप-सज्जा से उन्होंने अपनी सिद्ध-हस्तता को एक बार फिर से स्थापित कर दिया. वस्त्र-विन्यास भी नाटक के अनुरूप ही था. एल.ई.डी. पर्दे का प्रयोग कर के इतने सारे स्थलों को मंच पर बनाने की समस्या का निर्देशक ने कुशलता से हल पा लिया. लगभग अठावन विभिन्न भूमिकाओं वाले इस नाटक में, इतनी अधिक संख्या में कलाकारों के मंच पर आने-जाने इत्यादि सभी चीजों को सम्भालना आसान नहीं होता. इस के लिये मंच-प्रबन्धन के लिये जिम्मेवार व्यक्ति की प्रशंसा करनी होगी, कि नाटक में कहीं कोई विशेष दर्शनीय चूक नजर नहीं आई! मंच पर दो कारों को ला कर घटना को जीवन्त बना देने के लिये अक्षयवर जी की प्रशंसा करनी होगी!

इतनी सारी घटनाओं को दो-ढाई घंटे के नाटक में समेटना आसान नहीं होता. फिर भी, नाटक के आलेख में कुछ चुस्ती लाने की आवश्यकता से इंकार नहीं किया जा सकता. अभी स्वतन्त्रता के संग्राम में अपने जीवन को होम देने वाले हजारों किस्से दबे पड़े हैं. आशा है कि इस नाटक को देख कर अन्य लोग भी अपने जीवन की आहुति देने वाले उन व्यक्तियों के बारे में नाटक बना कर इस यज्ञ में अपना योगदान देंगे.




पश्मीना – दर्द का रिश्ता

पश्मीना – दर्द का रिश्ता
अनिल गोयल

हिन्दी में नया नाट्य-लेखन बहुत कम हो रहा है. जब हिन्दी साहित्य के मठाधीश नाटक को साहित्य की विधा ही नहीं मानते, तो इस में बहुत आश्चर्य की बात भी नहीं है!

ऐसे में, अर्थशास्त्र के विद्यार्थी रहे एक कॉर्पोरेट एग्जीक्यूटिव के द्वारा नाटक लिखा जाना एक सुखद आश्चर्य है. दिल्ली विश्वविद्यालय के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से अर्थशास्त्र का अध्ययन, और फिर एम.बी.ए. करने वाले मृणाल माथुर स्कूल और कॉलेज में नाटक देखते और करते थे. शिक्षा पूरी होने के बाद बीस वर्षों तक जीवन विज्ञापन जगत में कॉर्पोरेट एग्जीक्यूटिव के रूप में चलता रहा, लेकिन रचनात्मक अभिव्यक्ति की ज्वाला अन्दर कहीं दबी रही.

आखिर, 2015 में कॉर्पोरेट जीवन की घिसीपिटी नीरस जिन्दगी से उकता कर मृणाल ने कॉर्पोरेट जगत के साथ नाता तोड़ कर स्वतन्त्र कार्य करना प्रारम्भ कर दिया. अब जब कुछ समय अपने लिये मिला, तो मृणाल अपने पहले प्यार नाटक की ओर को मुड़े, नाटकों के लेखक के रूप में. अपनी पुरानी डायरियों और नोट्स को झाड़ा-पोंछा, और अगले छः वर्षों में बारह नाटक लिख डाले!

2018 में अपना पहला पूर्णकालिक नाटक ‘पश्मीना’ मुम्बई में एक प्रतियोगिता में भेजा, तो वह प्रथम तीन में चुन लिया गया. उस नाटक का मंचन साजिदा साजी ने किया. इस के बाद लिखे नाटक ‘अकबर दी ग्रेट नहीं रहे’ को दिल्ली में व्यावसायिक रूप से रंगकर्म करने वाले प्रसिद्ध निर्देशक डॉ. एम. सईद आलम ने उठा लिया, और वह नाटक भी सफल हो गया! पहले दो नाटक सफल हो गये, तो लेखन ही जीवन हो गया! इस के बाद के बाकी नाटक भी कुछ छपे, कुछ छपने की प्रक्रिया में हैं.

कभी प्रोफेशनल लेखक नहीं रहे एक कॉर्पोरेट एग्जीक्यूटिव की नाटक लिखने के पीछे सोच क्या रही, इस प्रश्न के उत्तर में मृणाल बताते हैं कि पिछले लगभग पन्द्रह वर्षों में हमारे समाज में चीजों को केवल एक ही पक्ष की ओर से देखने और दूसरे दृष्टिकोण को पूर्णतया नकारने की जो प्रवृत्ति पनप गई है, उस के प्रति एक वितृष्णा मेरे नाटकों में देखने को मिलेगी. दोनों ही ओर की अच्छी और बुरी दोनों ही चीजों को देखना और दिखाना आज के वर्तमान समाज में और अधिक आवश्यक हो गया है, इसी चीज को अपने नाटकों के माध्यम से मृणाल ने रेखांकित किया है.

आज की चल रही सोच के उलट चलने की भावना क्यों जागृत हुई, उस पर मृणाल बोले, “आजकल नाटकों के निर्देशकों के द्वारा लेखकों को किनारे कर देने की जो प्रवृत्ति विकसित हुई है, जिस में लेखक की आवश्यकता को ही नकार दिया जाता है, ऐसे में रंगमंच में लेखक की आवश्यकता पहले से बहुत अधिक हो गई है. डिवाइज्ड या एक्सपैरिमैंटल नाटक के नाम पर लेखक को रंगमंच से बाहर कर दिया गया है, जिस से नाटक में पात्रों का अन्तर्द्वन्द्व उभर कर नहीं आ पाता… उस में केवल अपने ‘डिजाईन’ को दिखाने की होड़ ही नजर आती है. जिस कन्फ्लिक्ट को, मॉरल डाइलेमा को एक लेखक नाटक में लाता था, उसे एक निर्देशक, ड्रामाटर्ज या डिजाइनर नहीं ला सकता! लेखन एक बिल्कुल ही अलग विधा है!”

उन के द्वारा लिखित आठ नाटकों की नौ प्रस्तुतियों का आयोजन इवैन्ट मैनेजमैंट कम्पनी विब्ग्योर ने ‘नाट्यकुम्भ’ के रूप में दिल्ली के एल.टी.जी. रंगमण्डप में 4 से 11 जून 2023 तक किया. इस समारोह की पहली, और आखिरी प्रस्तुति भी नाटक ‘पश्मीना’ की रही, जिसे पहले दिन साजिदा साजी, और अन्तिम दिन वाले प्रयोग में जफर मोहिउद्दीन ने निर्देशित किया. बाकी सभी नाटकों का एक-एक ही प्रयोग रहा. अन्य नाटक थे, हास्य नाटक ‘अकबर दी ग्रेट नहीं रहे’, ‘दीदी आई.ए.एस.’ और ‘पाँच रुपैया बारह आना’, व्यंग्य ‘तीन तुम्हारी तरफ’ और ‘बिट्वीन यू एंड मी’, हिन्दी-अंग्रेजी नाटक ‘लाल किले का आखिरी मुकदमा’ और अंग्रेजी नाटक ‘गॉड्स लायनेस’, जिस की रीडिंग ही की गई. इन में से कुछ हिन्दी-अंग्रेजी में लिखे गये द्विभाषी नाटक हैं.

टेलीविजन की निरर्थक बहस के आज के युग में मृणाल माथुर अपने नाटकों के माध्यम से समकालीन घटनाओं पर मंथन करते नजर आते हैं. वे दर्शकों को मीडिया से मिलते उपदेशों या भेड़चाल का शिकार न होकर अपनी स्वयं की अन्तर्दृष्टि विकसित करने और अवधारणाओं के पीछे जा कर देखने को कहते हैं, उन्हें अपनी ही सोच और कल्पनाशीलता को उभारने का सन्देश देते हैं.

साजिदा साजी द्वारा निर्देशित नाटक ‘पश्मीना’ नाट्यकुम्भ’ का पहला नाटक था. पश्मीना – कश्मीर का ऊनी कपड़ा, जिस से शॉल, मफलर, कोट इत्यादि बनाये जाते हैं. जो ऊष्मा देता है. एक भावशून्य हो चुके जीवन में गति लाने के लिये भी ऊष्मा की आवश्यकता होती है. और पश्मीने और ऊष्मा के इसी सम्बन्ध को लेखक ने अपनी कलम के माध्यम से हम तक पहुँचाया है. इस नाटक में एक मध्यमवर्गीय दम्पत्ति अमर और विभा सक्सेना का बेटा, जो भारतीय सेना में सैनिक था, कुछ समय पूर्व कश्मीर में आतंकवाद की हिंसा का शिकार हुआ था. शहीद होने से पहले, घर आने पर वह अपनी माँ के लिये एक पश्मीने की शॉल लाना चाह रहा था, ऐसा उस ने अपने पत्र में लिखा था. बेटे की मौत से भावशून्य हो गई अपनी पत्नी के जीवन में ऊष्मा लाने के लिये उसी पश्मीना शॉल की खोज में अमर विभा के साथ कश्मीर जाता है. वहाँ उनकी भेंट एक युवा, उद्दाम, चंचल सिक्ख व्यापारी दम्पत्ति से हो जाती है. ये दोनों ही जोड़े पश्मीने की एक छोटी सी दुकान पर जाते हैं, जो लोग स्वयं ही पश्मीने का सामान बनाते हैं. वहाँ शॉल के भाव पर मोलतोल करते हुए दुकानदार के बेटे के भी एक आतंक-विरोधी ऑपरेशन में मारे जाने की बात पता चलती है. कश्मीर में आतंकवाद से उपजी हिंसा को बहुत बार दिखाया गया है. लेकिन सामान्य जन की व्यथा को दोनों ही ओर से एकांगी दृष्टि से ही देखा जाता रहा है. ऐसे में, दोनों पक्षों की पीड़ा को एक साथ दिखाने का यह अभिनव प्रयास ही इस नाटक को विशिष्टता प्रदान करता है.

नाटक का प्रमुख आकर्षण है नाटक के दो प्रमुख कलाकारों साजिदा साजी और जॉय मितई के भावपूर्ण अभिनय के क्षण… कैसे अपने बेटे को कश्मीर के आतंकवाद की हिंसा में गँवा बैठा यह प्रौढ़ दम्पत्ति दर्द की विभिन्न परतों के बीच से गुजरता, उन के बीच एक सूक्ष्म सन्तुलन बनाता हुआ, अपनी भावनाओं पर नियन्त्रण पाने का सफल-असफल सा प्रयास करता, कश्मीर की यात्रा करते हुए अपने जीवन के कुछ अत्यन्त संवेदनशील क्षणों को जीता है. सबसे कारुणिक और संवेदनशील क्षण वे हैं, जब अमर और विभा को शॉल वाले के बेटे के बारे में पता चलता है! शॉल के साथ-साथ जो चीज इस दम्पत्ति को दुकानदार के साथ जोड़ती है, वह है अपने बेटे को खो देने की व्यथा! इस प्रकार का दर्द का सम्बन्ध दर्शकों को दो विपरीत धुरियों पर खड़े इन दोनों परिवारों की व्यथा के द्वारा कश्मीर-समस्या को एक सन्तुलित दृष्टि से देखने को प्रेरित करता है. इस प्रौढ़ माता-पिता और दुकानदार दोनों के ही दर्द एक जैसे हैं, जिस के कारण ये दोनों किसी एक स्तर पर जुड़े हुए भी हैं, जहाँ कोई भी अन्य बाहरी तत्व प्रवेश नहीं कर पाता है – साजिदा और जॉय ने जिस काव्यात्मक कोमलता के साथ, गैर-शाब्दिकता के साथ इन क्षणों को मंच पर जिया है, वह दिल्ली के रंगमंच में आज एक बहुत दुर्लभ चीज है, और वही इस नाटक को दर्शनीय बनाता है.

साजिदा इस नाटक को अभिनेता का नाटक मानती है… जहाँ निर्देशक और मंच पर अन्य सब कुछ भी गौण हो जाता है… केवल अभिनेताओं के द्वारा प्रेषित की जाने वाली संवेदनाएँ, और उन्हें अपनी आँखों और कानों से ग्रहण करते दर्शक ही प्रेक्षाग्रह में रह जाते हैं. और उसी तरीके से साजिदा ने इस नाटक को प्रस्तुत भी किया है… सैट के नाम पर केवल दरवाजों के तीन चौखटे बना दिये गये हैं, जो एक से दूसरे स्थान पर स्थानान्तरित होने का भी प्रतीक हैं, और जिन पर टंगी कपड़े की लम्बी पट्टियों को पश्मीने की दुकान में शालों के रूप में भी प्रयोग कर लिया गया है. मेकअप और किन्हीं विशिष्ट परिधानों की भी आवश्यकता नहीं अनुभव की गई, न ही इस नाटक की गम्भीर बात को कहने के लिये किसी विशेष प्रकाश-व्यवस्था की आवश्यकता हुई. साजिदा को लगा कि इस नाटक में युद्ध की समस्या को एक अलग दृष्टि से देखा गया है, और युद्ध की त्रासदी को बिना कोई बेचारगी का भाव उत्पन्न किये, बिना रोये-धोये, अपनी बात कह दी गई है. किसी अपने के चले जाने के दर्द के क्षण में आदमी सुन्न हो जाता है… इस नाटक में वही क्षण लगातार उपस्थित रहे… जब इन कलाकारों ने कथा के पात्रों के दर्द को केवल अपने अभिनय के द्वारा दर्शकों तक पहुँचा दिया. एक अच्छे नाटक की यही सब से बड़ी खूबी होती है.

साजिदा और जॉय राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षण ले कर दिल्ली में नाटक कर रहे हैं… गम्भीरता से, और लगातार, अपनी संस्था ट्रैजर आर्ट एसोसिएशन के माध्यम से. नौटंकी में इन के द्वारा किया गया एक सुन्दर प्रयोग कुछ वर्ष पूर्व मैंने देखा था. अपने चुने हुए व्यवसाय के प्रति पूर्ण निष्ठा और समर्पण ही इस जोड़े के काम को एक अलग महक देता है.

नाटक में सिक्ख जोड़े की भूमिका मोहम्मद शाहनवाज और रितु ने निभाई. दुकानदार की भूमिका में केयूर नन्दानिया थे, उस के बेटे की भूमिका में सूरज और बेटी की भूमिका में रिया पवार थीं. अमर और विभा के बेटे के रूप में थे सैफ सिद्दीकी, और डॉ. कौल की भूमिका अवनीश झा ने निभाई.
(चित्र सौजन्य: साजिदा साजी)




Im-Pact: Innovative Digital Theatre Based Corporate Training Practices

Theatre has the ability to transform, to bring about a radical change and also the tool to enhance productivity by opening us creatively. Theatre often makes us work against our own body, our own emotions by getting “into the skin of others”. This art makes us think beyond us, and only create the characters. As we are living right now in insecure times, in total social distancing and also in grave economic implications theatre based digital training programs will solve many of the grave implications.

The economy has deeply impacting not only the daily wagers but also companies such as the aviation sector, education, lifestyle, wellness and beauty just to name a few. What hence is needed is that the company looks for solutions first and foremost to increase the productivity of the employees.

Training of the soft skills like boosting the morale of the employees, improving
communication skills, stress management does increase the productivity of the employee;
however training has to primarily focus on increasing the revenue of a company and
bringing in more sales. For this what is critically needed is that while the company works
on the soft skills of the employees they also focus on the solutions to provide ways in which the revenues can be generated.

Here, is where Digital Theatre based Corporate Training Practices comes in. The Digital
methods that are focused not “inwards” or simply to “improve the soft skills of the
employee” but are “outward” driving most empathetically towards “enhancing production of the company.”

Here, one should realize that one should adopt the means of “gentle power of persuasion”
for employees to see and understand the needs of their mother company. Theatre being extremely persuasive and while keeping emotions as the cornerstone can further help in the this “gentle power of persuasion”. The employees should be urged to look beyond
themselves, their traditional roles in the company and think of the multiple ways they can
reinvent themselves in this stressful situation.

Rewards can be given to good solutions which could mean words of encouragement in a
mail forwarded to all employees or even small gifts and monetary benefits. No step should be seen as “not worthy enough”, if it is considered not worthy it enough then it should be analyzed why it is not worthy enough and what can be done to make it more effective.

Theatre does not discard any action but looks at it critically. The same should apply in this
Im-pactful theatre- based training practice. We are here looking at times that need
innovation, reinvention and reconsideration of what we know. It’s time to SURGE
FORWARD AND NOT LAMENT!




Natsamrat Theatre Festival spreads its wings to Mumbai

By Shraboni Saha

After establishing itself in Delhi, Natsamrat is now steadily making a mark in Mumbai as well. It successfully organised the 3rd Mumbai Theater Festival for Maharashtra audience

Natsamrat brought the Kumbh of plays for Mumbaikars i.e. 3rd Mumbai Theater Festival where five different plays were staged on May 26, 27 and 28 at Creative Adda Auditorium, Versova, Andheri West, Mumbai.

On May 26, at 6:30 pm, the play Napunsak, written by Manjul Bhardwaj, was staged and at 8:00 pm, the play Teen Bandar, written by Prabuddha Joshi, directed by Nagendra Kumar Sharma, both plays were staged.

The play Aadhi Raat ke Baad which was written by Dr. Shankar Shesh was staged on 27th May at 6:30 pm and the play Chukayenge Nahi, written by Dario-Fo and adapted by Amitabh Srivastava was staged at 8:00 pm and both the plays are directed by Chandrashekhar Sharma.

On May 28, at 7:30 pm, the play Kambakkht Ishq written by Satya Prakash was staged and the play is directed by Shyam Kumar, director of Natsamrat.

Artists from Delhi, Ambala, Mumbai presented the five different plays at the theater in Mumbai. In these plays, there was humor, adventure as well as social messages for the audience. Seeing the audience of Mumbai, it seemed as if they had a lot of love for theatre, that’s why the entire auditorium was packed on all three days. Natsamrat director Shyam Kumar says that if anyone wants to give something to the society, it can be done through drama and the audience definitely pays attention to it because it does not give stress to the mind, instead it gives a beautiful message through entertainment.




आपदा-काल में भास का सहारा

‘आपदा को अवसर में बदलना’ – आजकल यह उक्ति प्रायः सुनने को मिल जाती है. आज के समय की जीवित स्मृति में सबसे बड़ी आपदा रही करोना. सब लोग अपने-अपने घरों के अन्दर बन्द हो जाने को मजबूर हो गये थे. ऐसे में, विज्ञान से ले कर नाटक तक हर विषय पर सैंकड़ों-हजारों लोगों ने ‘ऑनलाइन’ या इन्टरनैट पर चर्चा के माध्यम से आपसी सम्बन्ध और संवाद को चलाये रखा, और करोड़ों मनुष्यों के मानसिक सन्तुलन को बनाये रखने में एक प्रशंसनीय भूमिका निभाई!
ऐसी ही एक चर्चा का सहभागी बनने का सौभाग्य मुझे भी मिला. करोना के कालखण्ड में ही ग्वालियर की गीतांजलि गीत ने अपने रंगसमूह ‘मेरा मंच’ के माध्यम से भास के तेरह नाटकों पर भारतरत्न भार्गव के व्याख्यानों की एक श्रृंखला आयोजित की थी. संगीत नाटक अकादमी अमृत सम्मान से सम्मानित, आकाशवाणी, बी.बी.सी. तथा संगीत नाटक अकादमी से जुड़े रहे भारतरत्न भार्गव डॉ. कमलेश दत्त त्रिपाठी तथा कवलम नारायण पणिक्कर जैसे दिग्गजों के साथ काम कर चुके हैं, और सम्प्रति टैगोर फैलोशिप ले कर शोध कर रहे हैं.
इन व्याख्यानों की सबसे रोचक बात रही इनका समय! यह व्याख्यानमाला सायं चार बजे से होती थी. उन दिनों में, काम कोई न होने के कारण हम दोपहर में खाना खा कर सो जाते थे. फिर, चार बजे से कुछ ही पहले नींद खुलती थी, भागते-दौड़ते जैसे-तैसे मैं कंप्यूटर खोलता था, कपड़े पहनता था, पत्नी भी जाग जाती थीं, तब तक भारतरत्न जी का व्याख्यान प्रारम्भ हो चुका होता था! व्याख्यान सुनते-सुनते ही पानी पीता था, चाय आ जाती थी, वह भी पीता रहता था, लगता था कि बिस्कुट खा रहा हूँ, और वह नमकीन होता था; कभी नमकीन के चक्कर में बिस्कुट खा जाता था! करोना काल में बचे हुए हम लोगों की बहुत सी दुखद, लेकिन कुछ मधुर, रोमांचकारी स्मृतियाँ भी हैं! उन्हीं में से एक गीतांजलि गीत द्वारा आयोजित व्याख्यानों की यह श्रृंखला भी थी.
भास के नाट्य-साहित्य पर आधारित इस श्रृंखला का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण पक्ष था प्रतिदिन के व्याख्यान के बाद का प्रश्नोत्तर-काल. इसके लिये भार्गव जी ने यथेष्ट समय माँगा, जिसे गीतांजलि ने मुक्तमन से स्वीकार किया. और सच में, यह श्रृंखला गीतांजलि की श्रृंखला न रह कर भार्गव जी और श्रोताओं की श्रृंखला बन गई! बाद में, सभी ने इसे पुस्तक के रूप में प्रकाशित करवाने का सुझाव दिया. अब सेतु प्रकाशन के संस्थापक-संचालक अमिताभ राय ने, जो इस श्रृंखला से प्रारम्भ से ही इससे जुड़े रहे, इन व्याख्यानों तथा प्रश्न और उत्तरों को ‘महाकवि भास का नाट्य वैशिष्ट्य’ नाम से पुस्तक रूप में प्रकाशित किया है. बातचीत की स्वाभाविकता को बनाये रखने, और इसे आत्मीय संस्पर्श देने के उद्देश्य से इसकी भाषा को यथावत रखा गया है, जो पुस्तक को बहुत पठनीय बना देता है.
“ग्यारहवीं–बारहवीं शताब्दी से जो आक्रान्ता आये, उन्होंने तक्षशिला, नालन्दा जैसे विश्वप्रसिद्ध केन्द्रों को ध्वस्त कर दिया, नष्ट कर दिया” – इस प्रकार का क्षोभ प्रकट करने के बाद इन नाटकों को फिर खोज लिये जाने की कहानी भार्गव जी विषय-प्रवेश में सुनाते हैं, और, कि कैसे ये नाटक केरल के देवालयों अर्थात कुताम्बलम में खेले जाते रहे, लेकिन खोज लिये जाने के लगभग सत्तर वर्षों के बाद भी ये नाटक हमारे लिये अपरिचित ही रहे, और कैसे सन 1974 में शान्ता गाँधी के द्वारा भास के ‘स्वप्नवासवदत्ता’ नाटक को अमेरिका के हवाई विश्वविद्यालय में सफलतापूर्वक खेलने पर भारत के लोगों की नींद टूटी, और उनका ध्यान इन नाटकों की ओर गया. भार्गव जी को पणिक्कर जी ने बताया कि केरल में कुड़ियाट्टम, कथक्कली और नाट्यशास्त्र के विद्वान अप्पुकुट्टन नायर ने तभी केरल संगीत नाटक अकादमी के सचिव बने पणिक्कर जी को कुड़ियाट्टम और नाट्यशास्त्र से परिचित करवाया, जिससे पणिक्कर जी संस्कृत नाटकों के प्रति आकृष्ट हुए. बाकी सब तो जाना-पहचाना इतिहास है.
बाद में पणिक्कर जी ने कालिदास संस्कृत अकादमी में ‘मध्यमव्यायोग’ नाटक का मंचन करके उत्तर भारत के लोगों को भास के नाटकों से परिचित करवाया. भार्गव जी बताते हैं कि इन नाटकों की सबसे बड़ी विशेषता है इनके कथानक. कालिदास से पहले के काल में रहे भास के तेरह में से छः नाटक महाभारत पर आधारित हैं. दो नाटक, ‘अभिषेक’ और ‘प्रतिभा’ रामायण पर आधारित हैं. एक नाटक ‘बालचरित’ कृष्ण की कथाओं पर आधारित है. ‘स्वप्नवासवदत्ता’, ‘प्रतिज्ञा यौगन्धरायण’, ‘अविमारक’ और ‘चारुदत्त’, ये चार नाटक उनकी मूल कृतियाँ मानी जाती हैं.
‘मेरा मंच’ के माध्यम से भास के तेरह नाटकों पर व्याख्यानों की श्रृंखला, वहाँ उठे प्रश्न और जिज्ञासाओं, और श्रोताओं की रुचि ने भार्गव जी को इन नाटकों के हिन्दी भाषा में पाठान्तर की भूमिका तैयार कर दी. पाठान्तर वाले भास के इन सभी तेरह नाटकों को सेतु प्रकाशन ने ही ‘भास नाट्य समग्र’ के नाम से छापा है. भास के नाटकों के अन्य अनुवादों या पाठान्तरों और भार्गव जी के पाठान्तर में मूल अन्तर यह है, कि उन्होंने इन नाटकों का पद्यात्मक पाठान्तर किया है. यह पाठान्तर करते समय उन्होंने ‘नाट्यशास्त्र में निर्देशित संहिता के अनुसार’ तनिक छूट भी ली है, जिससे ‘इन नाटकों की समकालीन उपयोगिता में यत्किंचित वृद्धि हो सके’. इसीलिये वे इसे अनुवाद न कह कर पाठान्तर कहते हैं, जिससे कि आंगिक और वाचिक अभिनय में भाव, राग तथा ताल के तात्विक गुणों का समन्वय हो सके. सबसे अच्छी बात है, कि इन दोनों पुस्तकों को पाठकों को उचित मूल्य पर उपलब्ध करवाने के लिये प्रकाशक ने इन्हें पेपरबैक में छापा है, जिससे ये पुस्तकें साधारण जन के लिये बहुत आसानी से सुलभ हो सकेंगी.
भास की विलक्षण प्रतिभा को समझने के लिये ‘महाकवि भास का नाट्य वैशिष्ट्य’ का पढ़ना आवश्यक है! और भास के नाटकों को पढ़ने के लिये दूसरी पुस्तक ‘भास नाट्य समग्र’ का पढ़ना तो आवश्यक है ही! और यदि पाठक ‘भास नाट्य समग्र’ को भास के नाटकों के संस्कृत संस्करणों के साथ रख कर पढ़ेंगे, तो उन्हें इन प्राचीन नाटकों के आज के समय में प्रासंगिक होने का भान हो सकेगा!




गली दुल्हन वाली

गली दुल्हन वाली
टिप्पणी — अनिल गोयल

दिल्ली की रामलीला से अपने अभिनय-जीवन का प्रारम्भ करने वाले सुभाष गुप्ता 1975 में ‘नाटक पोलमपुर का’ में समरू जाट की भूमिका से ‘अभियान’ रंगसमूह से जुड़े. अभियान की स्थापना इसके कुछ ही पहले, 1967 में, दिल्ली के कुछ उत्साही रंगकर्मियों ने की थी. सुभाष गुप्ता के द्वारा ‘अभियान’ के लिये रूपान्तरित और निर्देशित नाटक ‘गली दुल्हन वाली’ का प्रदर्शन 15 अप्रैल 2023 को दिल्ली के लिटिल थिएटर ग्रुप प्रेक्षागृह में हुआ. यह नाटक मीरा कान्त की इसी नाम की कहानी पर आधारित है. केवल सन्दर्भ के लिये, मीरा कान्त अपनी इस कहानी को स्वयं भी एकल नाटक के रूप में रूपान्तरित कर चुकी हैं.

‘गली दुल्हन वाली’ नगीना नाम की एक अनपढ़ स्त्री के संघर्ष की कथा है. नगीना विवाह के पश्चात् एक कसाई रज्जाक की ‘दुल्हन’ बन कर आती है, और अपने पति के द्वारा पीटे जाने और दुर्व्यवहार का शिकार होती है. वह जिस गली में रहती है, वह गली ही नगीना के दुल्हन वाले रूप का वहन करती हुई ‘गली दुल्हन वाली’ के नाम से पहचानी जाने लगती है. नगीना काफी समय तक अपने पति के दुर्व्यवहार को सहती रहती है. लेकिन जब वही सब कुछ उसके बच्चों के साथ होता है, तो वह इस सब को अस्वीकार करके अपने बच्चों की रक्षा के लिये खड़ी हो जाती है. वह शिक्षा को ही अपने बच्चों के उद्धार का माध्यम मानती है, और इस विषय पर अपने पति से किसी समझौते के लिये तैयार नहीं होती. अपनी नाबालिग बेटी के एक बड़ी वय के आदमी के साथ विवाह के प्रश्न पर वह खुल कर अपनी बेटी की रक्षा में आ जाती है. उसके पड़ोस में रहने वाली एक हिन्दू महिला, गौरी की माँ एक पड़ोसन के नाते उसके इस संघर्ष में उसका साथ निभाती है. किस प्रकार से अत्यन्त साधारण से लगने वाले प्राणी छोटे-छोटे संघर्ष कर के समाज में बड़े परिवर्तन ले आते हैं, इस नाटक को देखने से नजर आता है. यह नाटक मनुष्य की इच्छा-शक्ति के बल को रेखांकित करता है. अपने पति से लगातार पिटते रहने वाली वह अनपढ़ स्त्री एक सीमा के बाद, केवल अपनी इच्छा-शक्ति के बल पर ही, उसके विरुद्ध खड़ी हो पाती है और उसके सामने झुकने से इंकार कर देती है.

बहुत वर्ष पूर्व, दिल्ली में एक बंगाली नाटक ‘शानु रॉयचौधरी’ में स्वातिलेखा सेनगुप्ता को एकल अभिनय करते देखा था. भाषा का अवरोध होते हुए भी, लगभग ढाई घंटे के नाटक में मंच पर स्वातिलेखा अकेले ही लगातार दर्शकों को बांधे रही थीं. कुछ वैसा ही अनुभव इस नाटक में श्रुति मेहर नोरी को नगीना की भूमिका में देख कर हुआ. सुभाष गुप्ता ने इस एक-पात्रीय कहानी को रूपान्तरित करते हुए नगीना के पति रज्जाक का भी चरित्र नाटक में बना दिया है. रज्जाक की भूमिका में नीतीश पाण्डे के पास सीमित ही सम्भावनाएँ उपलब्ध थीं, जिनका उन्होंने अच्छे से उपयोग किया. लेकिन नगीना के चरित्र में विद्यमान अपार सम्भावनाओं का श्रुति ने भरपूर उपयोग किया, और नाटक को दर्शनीय बनाया. नीतीश और श्रुति दोनों ही कलाकार हैदराबाद के निवासी हैं, हालाँकि नीतीश का मूल स्थान उत्तर भारत है.

और इसी कारण, नाटक के संवादों में विशुद्ध पुरानी दिल्ली या दिल्ली छः के उच्चारण को प्राप्त कर लेने का श्रेय नाटक के निर्देशक को भी जाता है. हैदराबाद के भारी-भरकम लहजे वाली उर्दू को छोड़ कर उन्होंने श्रुति से पुरानी दिल्ली वाले लहजे को इस नाटक में बहुत सफलता के साथ प्रयोग करवाया. दिल्ली छः की भाषा का उसकी बारीकियों को जाने बिना ही विभिन्न फिल्मों में बड़ा व्यापारिक उपयोग किया गया है. लेकिन सुभाष गुप्ता का स्वयं का बचपन वहाँ बीता है, अतः वे इस नाटक की भाषा के साथ न्याय कर पाये हैं.

एकल नाटक में एकरसता या मोनोटोनी की समस्या सदैव ही रहती है. यों भी, दिल्ली का आजकल का दर्शक बहुत जल्दी ऊब जाता है. ऐसे में, एक तो नाटक के आलेख को सम्पादित करके कुछ छोटा करने की आवश्यकता है. दूसरे, इस नाटक में एकरसता की समस्या कुछ अधिक ही अनुभव की गई, विशेषकर नाटक के पूर्वार्द्ध में, जब तक रज्जाक का प्रवेश नहीं हुआ था. दर्शकों को बांधे रखने के लिये निर्देशक को इस पक्ष पर विचार करना होगा. आलेख में कुछ छोटे-मोटे परिवर्तन करके नगीना के इस सशक्त चरित्र को कुछ और अधिक बहुआयामी बनाने की सम्भावनाएँ नाटक में हैं. लगातार फ्लैशबैक में चलने वाले इस नाटक में, गली में बहुत सी घटनाएँ घटित होती हैं. गली में घटित होने वाली घटनाओं को दिखाने के लिये, घर के दरवाजे को किसी अन्य स्थान पर स्थानान्तरित करके भी बहुत सशक्त तरीके से प्रस्तुति की एकरसता को समाप्त किया जा सकता है. इससे नगीना और रज्जाक दोनों ही का चरित्र और अधिक उभर कर आयेगा.

एकल नाटक होने के कारण कलाकारों के परिधान में बहुत अधिक सम्भावनाएँ नहीं थीं. और अभियान तो बिना टीम-टाम के, अपनी सादगीपूर्ण, यथार्थवादी प्रस्तुतियों के लिये ही जाना जाता है. फिर भी, फ्लैशबैक के दृश्यों में यदि एकाध स्थान पर कलाकारों के परिधान बदले रहते, तो नाटक की एकरसता को तोड़ा जा सकता था.

अभियान पिछले पचपन वर्षों से अधिक से नाटक करता आ रहा है. उनके पास मंच पर और मंच के पीछे एक बहुत सशक्त टोली है. उस सशक्त आधार को प्रयोग करके, और कुछ नये नाटकों और आलेखों का प्रयोग करके अभियान दिल्ली के सुप्तप्रायः रंगमंच-जगत में नई जान फूँकने की क्षमता रखता है. इसके साथ ही साथ, उनके पास अपना एक बहुत सशक्त दर्शक-वर्ग भी है. ऐसे में दिल्ली के दर्शकों की अभियान से कुछ अलग विषयों पर, और कुछ नये नाटकों की अपेक्षा करना अनुचित नहीं होगा! हिन्दी में पुराने और नये भी बहुत से अच्छे नाटक हैं. आशा है कि अभियान इस ओर ध्यान देगा.

आजकल दिल्ली में नाटक करने के लिये प्रेक्षागृह तीसरे पहर दो बजे ही मिल पाता है! और पाँच या छः बजे शो होता है. उसके पहले कलाकारों के द्वारा एक रिहर्सल भी जरूरी होती है. ऐसे में, मंच-आलोकन करने वाले व्यक्ति को कठिनाई से एक-दो घंटे का ही समय लाइट-डिजाईन करने के लिये मिलता है! इतने कम समय में क्या मंच-आलोकन सम्भव है? और यदि यह सम्भव नहीं है, तो क्या दिल्ली में मंच-आलोकन की कला समाप्त हो जायेगी? इस प्रश्न पर दिल्ली के रंगकर्मियों को गम्भीरता से विचार करना होगा, और इस विषय में कुछ कदम उठाने ही होंगे; अन्यथा, आजकल की तथाकथित “इंटैलीजैंट लाइट्स” मंच-आलोकन की प्रयोगशीलता को समाप्त कर देंगी!




मन के भँवर

मन के भँवर
अनिल गोयल

हिन्दी में नाटकों की कमी का रोना रोते रहना हमारे रंगकर्मियों का प्रिय व्यसन है, जबकि हजारों नाटक हिन्दी में लिखे गये हैं. लगभग पाँच दशक पूर्व लिखी गई डॉ. दशरथ ओझा की पुस्तक ‘हिन्दी नाटक कोश’ में ही अनगिनत नाटकों का विवरण दिया गया है; इसके बाद से तो और न जाने कितने नाटक लिखे जा चुके हैं. किसी भी अच्छे पुस्तकालय में नाटकों की सैंकड़ों पुस्तकें मिल जाती हैं. रुदाली के इस व्यसन में रत हमारे रंगकर्मी मराठी, बंगाली, कन्नड़ इत्यादि भारतीय भाषाओं, तथा विदेशी भाषाओं से भी नाटकों का हिन्दी में अनुवाद करके काम चलाते रहे हैं.

इससे कहीं अधिक आसान काम था अपनी ही भाषा में मंचन-योग्य नाटक खोजना. किन्तु वह काम हमारे रंगकर्मियों ने नहीं किया. ऐसे में, अपने उत्कृष्ट अभिनय के लिये संगीत अकादमी सम्मान से सम्मानित भूपेश जोशी ने साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित नाटककार दया प्रकाश सिन्हा के नाटक ‘मन के भँवर’ को खोज कर और उसे मंचित करके एक प्रशंसनीय कार्य किया है. हिन्दी के एक प्रतिष्ठित लेखक के एक लगभग भुला दिये गये एक मूल हिन्दी नाटक को प्रस्तुत करना सचमुच भूपेश की खोजी नजर को दर्शाता है. साठ और सत्तर के दशकों में आकाशवाणी पर मनोवैज्ञानिक घटनाक्रम वाले अनेक नाटक प्रसारित हुए. परन्तु उन्हें रंगमंच पर शायद ही कभी मंचित किया गया होगा. रेडियो नाटक को नाटक की विधा क्यों नहीं माना गया, यह शोध का विषय हो सकता है, हिन्दी साहित्य की ही तरह हिन्दी रंगमंच भी अपने-अपने दड़बों में बन्द रहने की प्रवृत्ति का शिकार रहा है…
सन 1960 में लिखा गया नाटक ‘मन के भँवर’ मनोवैज्ञानिक विश्लेषण पर आधारित एक बहुत ही संवेदनशील नाटक है। तलाक का कानून पारित हो जाने के बाद, साठ के दशक में भारतीय समाज में परिवारों के विघटन का काल प्रारम्भ हो चुका था. स्वतन्त्रता के बाद भारतीय समाज में तीव्र गति से परिवर्तन भी आ रहे थे. इन सब परिवर्तनों के चलते पति-पत्नी के बीच की बढ़ने वाली दूरियों और परिवारों के विघटन का चित्रण इस नाटक में किया गया है. अचम्भे की बात है कि मात्र पच्चीस वर्ष की आयु में ही दया प्रकाश सिन्हा ने इस पारिवारिक टूटन और विघटन का इतना सटीक चित्रण कैसे किया! और उससे भी अधिक अचम्भे की बात है हिन्दी रंगमंच-जगत की इस नाटक की पूर्ण उपेक्षा. दया प्रकाश सिन्हा के अनुसार, इस नाटक के लिखे जाने के बाद के कुछ वर्षों में इसके कुछ मंचन इलाहाबाद (अब प्रयागराज) और लखनऊ इत्यादि में हुए थे. लेकिन उसके बाद साठ वर्षों तक, नाटकों की कमी का रोना रोते रह कर भी किसी ने इस नाटक पर ध्यान नहीं दिया! 1968 में प्रकाशित इस नाटक के पचपन वर्षों में इस नाटक की पूर्ण उपेक्षा हिन्दी रंगमंच की सोच को बखूबी दर्शाती है!

नाटक का शीर्षक ‘मन के भँवर’ नाटकों के दो प्रमुख पात्रों डॉ. वशिष्ठ और उनकी पत्नी छाया के मन में उठते विचारों के भँवर का ही चित्रण है. विचारों की भँवरों में डूबती-उतराती युवा गृहिणी छाया अपने जीवन के पिछले दिनों में ही कैद है, और उससे बाहर आने का कोई प्रयास वह नहीं करती है. दूसरी ओर, डॉ. वशिष्ठ अपने रोगियों की चिकित्सा में पूर्ण समर्पण भाव से रत हैं. वे अपनी एक मनोरोगी पूनम के उपचार के लिये उससे बहुत कोमलता और मधुर तरीके से बातचीत और व्यवहार करते हैं. छाया उन दोनों के बीच की बातचीत को उनके बीच बढ़ती नजदीकियाँ मानने की भूल करती है, और डॉ. वशिष्ठ के साथ व्यंग्यात्मक तरीके से बातचीत करके उनके चरित्र पर उँगलियाँ उठाने लगती है. इससे पति और पत्नी के बीच टकराहट की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, और तदुपरान्त वे दोनों खुल कर एक-दूसरे पर प्रहार करने लगते हैं.
वास्तव में, इन दोनों के बीच के अन्तर का मूल कारण इन दोनों की बिल्कुल अलग-अलग पृष्ठभूमि का होना, और छाया का पूर्ण असहयोगी रवैया हैं. आर्थिक दृष्टि से बहुत सम्पन्न परिवार से आई छाया के मन में अपने पति के लिये तनिक भर भी सम्मान नहीं है, न ही उसका अपनी वाणी या व्यवहार पर कोई नियन्त्रण है. छाया का यह असंवेदनशील व्यवहार पति-पत्नी को एक-दूसरे से दूर कर देते हैं, जिसमें परिवार जैसी किसी चीज के प्रति छाया के मन में बिलकुल भी सम्मान नहीं है. इसी बीच, छाया के कॉलेज के दिनों का मित्र, एक निम्न स्तर का फिल्म-अभिनेता देवेन्द्र छाया के घर आता है, और उसे अपनी बातों के सब्जबाग दिखा कर अपने साथ भगा ले जाने में सफल होता है. डॉ. वशिष्ठ अकेले पड़ जाते हैं, और अपना पूरा समय अपने रोगियों की सेवा में लगा देते हैं. बाद में छाया के मर जाने का समाचार आता है. डॉ. वशिष्ठ को उनकी सेवाओं के लिये भारत सरकार और यूनेस्को से सम्मान प्राप्त होता है, तो नगर के लोग उनका सम्मान करने के लिये जलूस के रूप में उनके घर आ रहे हैं. तभी मृत-घोषित छाया वहाँ आ जाती है, और डॉ. वशिष्ठ से अपने लिये सहारा माँगती है, क्योंकि तब तक देवेन्द्र की भी मृत्यु हो चुकी है, और अब छाया अकेली है. डॉ. वशिष्ठ उसे स्वीकार नहीं कर पाते, और छाया वहाँ से चले जाने पर मजबूर हो जाती है. लेकिन घर के बाहर निकलते ही उसकी मृत्यु हो जाती है. डॉ. वशिष्ठ को जब किसी ‘अनजान’ स्त्री के उनके घर के सामने मर जाने का समाचार दिया जाता है, तो वे छाया के एक अनजान महिला की लाश के रूप में ले जाये जाने पर चुप रह जाते हैं, हालांकि इस समाचार से वे गहरे मानसिक दबाव में अवश्य आ जाते हैं. और उसी दबाव के फलस्वरूप, अपने को इस सब के लिये दोषी मान कर वे विष खा कर अपना प्राणान्त कर लेते हैं.

इस नाटक में छाया एक ऐसा दुरूह चरित्र है, जिसके पास जब सब कुछ था, तो उसने उसकी महत्ता नहीं समझी। और फिर, जब उसके हाथ से सब कुछ छूट गया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। समय रहते उसने रिश्तों को सम्मान नहीं दिया, और फिर वह उलझ गई मन के भंवर में। प्रताप सहगल इस नाटक को ‘कथा एक कंस की’ के साथ दया प्रकाश सिन्हा के दो श्रेष्ठ नाटकों में से एक मानते हैं. नाटक में छाया के रूप में मोहिनी सुंगर ने, और डॉ. वशिष्ठ के रूप में नाटक के निर्देशक भूपेश जोशी ने बहुत सुन्दर अभिनय किया. भूपेश जोशी सामान्य चरित्रों की अपेक्षा जब इस प्रकार के मनोवैज्ञानिक चरित्रों के रूप में आते हैं, तो उनके अभिनय में एक अलग ही निखार आ जाता है… मानसिक दबाव को झेलता, अपनी सिगरेट से अपनी बेबसी को झलकाता हुआ, अपने को समाज की सेवा में पूर्णतः समर्पित कर चुका एक आदर्शवादी डॉक्टर कैसे अपनी घमण्डी और नासमझ पत्नी के व्यवहार का शिकार होता रहता है, कैसे वह अपने विवाह के तुरन्त बाद से लगातार एक बेबसी का जीवन जीने को विवश हो जाता है, भूपेश ने चरित्र में डूब कर बहुत सशक्त तरीके से इसको जिया. इसी प्रकार, अपने प्रेमी देवेन्द्र के मर जाने पर अकेली पड़ जाने के बाद छाया जब डॉ. वशिष्ठ के पास लौटती है और उनके सामने गिड़गिड़ा कर उससे अपने को वहाँ रहने देने की भीख माँगती है, इसे मोहिनी सुंगर ने बहुत सुन्दरता के साथ मंच पर प्रस्तुत किया.
लेकिन ऐसे सुन्दर नाटक में किस प्रकार के प्रकाश-संयोजन की आवश्यकता है, इसे इस नाटक के प्रकाश संयोजक नहीं समझ पाये. डॉ. वशिष्ठ और छाया के पल-पल बदलते मूड को यदि उचित प्रकाश-परिकल्पना का सहयोग मिला होता, तो नाटक और भी अधिक प्रभावशाली बन पाता!

प्रकाश-सञ्चालन को ले कर भी निराशा ही हाथ लगी. मंच-आलोकन में कथानक और चरित्रों की मनोदशा को यदि प्रकाश-संयोजक न समझ पाये, तो नाटक दर्शकों पर अपना सम्पूर्ण प्रभाव छोड़ने में विफल हो जाता है. इस प्रकार के नाटकों में लाईटों का खेल नहीं, बल्कि नाटक के मूड के अनुसार अति-संवेदनशील

प्रकाश-व्यवस्था करने से ही नाटक दर्शकों तक पहुँच पाता है. यदि इस नाटक का कथानक बहुत सशक्त न होता, तो यह नाटक एक विफल नाटक की श्रेणी में आ जाता! रवि शंकर शर्मा का संगीत अवश्य इस नाटक के प्रवाह को सम्भालने में एक सीमा तक सफल रहा.

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मिस्टर राईट

मिस्टर राईट
अनिल गोयल

समुद्र-मन्थन के समय देवताओं और दानवों के बीच हुए संघर्ष के समय से ही अच्छे और बुरे के बीच के द्वंद्व को विभिन्न तरीकों से दिखाया जाता रहा है. राम और रावण का संघर्ष हो या कृष्ण और कंस का, मनुष्य के मन की दैवीय और राक्षसी प्रवृत्तियों के बीच का यह संघर्ष सदैव से यूँ ही चलता आया है, और जब तक मनुष्य नाम का यह दो पैरों वाला प्राणी इस पृथ्वी पर है, यह संघर्ष यूँ ही चलता रहेगा.

26 मार्च को चाणक्यपुरी में नेपथ्य फाउंडेशन द्वारा माला कुमार के निर्देशन में नाटक ‘मिस्टर राईट’ मंचित किया गया. नाटक के लेखक मोहित चट्टोपाध्याय (चटर्जी) ने अपने इस नाटक में इस संघर्ष को एक नये ही तरीके से प्रस्तुत किया है. उन्होंने अपने इस नाटक में दिखाया है कि अच्छी और बुरी दोनों ही प्रवृत्तियाँ मनुष्य के अन्दर ही रहती हैं, जैसे कि हमारे दो हाथ हमारे साथ हमेशा रहते हैं, और बुरी प्रवृत्तियों से बचने के लिये मनुष्य को जीवन भर सतत प्रयास करते रहना होता है. नाटक में, एक दुर्घटना में रजत (संजीव जौहरी) की कार के नीचे आ कर उसके एक जानकार रुशेन की मृत्यु हो जाती है. रुशेन का विवाह तन्द्रा (सुनीता नारायण) से होने वाला था. तन्द्रा मानती है कि यह कोई दुर्घटना नहीं थी, बल्कि रजत ने जानबूझ कर रुशेन की हत्या की है. रजत उसे समझाने का प्रयास करता है, कि यह सचमुच एक दुर्घटना भर थी, और दुर्घटना के उस क्षण में उसका अपने दाहिने हाथ पर नियन्त्रण नहीं रहा था. स्वाभाविक रूप से, तन्द्रा उसकी बात का मजाक उड़ाती है. इस पर रजत, या फिर उसका नियन्त्रण से बाहर जा चुका उसका दाहिना हाथ तन्द्रा का गला घोटने लगता है, जिससे तन्द्रा बहुत कठिनाई से बच पाती है.

रजत अपनी इस समस्या से छुटकारा पाने के लिये एक पण्डित (प्रदीप कुकरेजा) को बुलाता है. पण्डित एक रक्षा-सूत्र उसके हाथ में बाँध कर चला जाता है, परन्तु उससे रजत की स्थिति में कुछ विशेष अन्तर नहीं पड़ता. रजत अपने डॉक्टर मित्र सिन्धु (प्रवीण कुमार) से इस बारे में बातचीत करता है, तो सिन्धु बताता है कि रजत को एक बहुत ही अनजानी सी बीमारी है, जिस में व्यक्ति का अपने शरीर के किसी अवयव पर से अधिकार समाप्त हो जाता है, और वह अवयव स्वतन्त्र रूप से काम करने लगता है. रजत को समझ आ जाता है, कि उसके मन के विकारों ने उसके दाहिने हाथ पर नियन्त्रण पा लिया है, और अब उसका दाहिना हाथ ‘मिस्टर राईट’ उसकी नहीं सुनेगा. इस बीच, एक अनजान युगल, बॉबी (कीमती आनन्द) और मिली (माला कुमार) उसके घर में शरण लेने के लिये आते हैं, तो भी रजत का ‘मिस्टर राईट’ मिली के साथ गलत हरकत करने का प्रयास करता है, लेकिन वे दोनों उसे ठग कर चले जाते हैं. इसके बाद रुशेन के भाई विमल बाबू (संजीव सलूजा) आकर रजत को बताते हैं, कि रुशेन मानसिक समस्या से ग्रस्त था. जब तन्द्रा को इस बात का पता चलता है, तो उसके मन की गलतफहमियाँ दूर हो जाती हैं. उसके मन में उठे सद्भावों से सशक्त हो कर धीरे-धीरे रजत अपने ‘मिस्टर राईट’ पर भी अपना अधिकार पुनः पाने में सफल होता है.

नाटक के ज्यादातर कलाकार दिल्ली के पुराने, बहुचर्चित और मंजे हुए कलाकार हैं, और एकदम कसा हुआ अभिनय करने के लिये जाने जाते हैं. इसी कारण, नाटक में सभी कलाकारों का अभिनय बहुत शक्तिशाली रहा. नाटक की निर्देशिका माला कुमार दूरदर्शन व रेडियो से लगातार जुड़ी रही हैं. अभियान रंगसमूह के साथ उन्होंने बहुत काम किया है, और पिछले लगभग 5-6 वर्षों से अपनी संस्था ‘नेपथ्य’ चला रही हैं. इस नाटक की मंच-सज्जा और कलाकारों के परिधान में भी एक सुरुचिपूर्ण, कलात्मक दृष्टि स्पष्ट नजर आती थी.

रजत की भूमिका निभाने वाले संजीव जौहरी अनेक प्रसिद्ध नाट्य –निर्देशकों के साथ काम कर चुके हैं. उन्होंने रंगमंच पर अपना पदार्पण 1989 में अभियान रंगसमूह के नाटक ‘चक्रव्यूह’ के साथ किया था. वे ‘अभियान’ के लिए ‘अंधी गली’, ‘मिस्टर राईट’ तथा ‘पंछी ऐसे आते हैं’ का निर्देशन कर चुके हैं. उन्होंने ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन के लीला आर्ट्स प्रोडक्शन के लिए भी ‘जात ही पूछो साधु की’, ‘पंछी ऐसे आते हैं’ तथा रवीन्द्रनाथ ठाकुर के नाटक ‘राजा’ की संगीतमय प्रस्तुतियां दी हैं. ‘इल्हाम’ में सुभाष गुप्ता के निर्देशन में अभिनय करने के साथ-साथ और भी कितने ही नाटकों में अभिनय किया है. कीमती आनन्द का नाम तो दिल्ली के पुराने लोग बहुत अच्छे से जानते हैं…. दिल्ली में रंगमंच व दूरदर्शन के वे जाने-पहचाने कलाकार हैं. मॉडर्न स्कूल में पढ़े, और मॉडर्न स्कूल ओल्ड स्टूडेंट्स एसोसिएशन से जुड़े रहे प्रदीप कुकरेजा भी दिल्ली रंगमंच का पुराना, जाना-पहचाना चेहरा हैं, जो रेडियो और दूरदर्शन पर अभिनय करते रहे हैं. सुनीता नारायण को संजीव जौहरी ने अभियान के लिये निर्देशित किये नाटक ‘अंधी गली’ में अभिनय के लिये लिया था. सिन्धु के रूप में प्रवीण कुमार, पत्रकार की भूमिका में अतिन रस्तोगी, और नौकर मंगल की भूमिका में आशीष अग्रवाल ने भी अपना मोहक अभिनय दे कर नाटक की सफलता में अपनी-अपनी भूमिका निभाई.




Beastly Tales: Animal and Human Fables

Naseeruddin Shah and Ratna Pathak Shah performing in Beastly Tales

Beastly Tales : Animal and Human Fables
A review by Manohar Khushalani


READINGS: Beastly Tales
Poems by Vikram Seth with Stories by James Thurber
Presented by Motley
Recitations by Naseeruddin Shah;
Ratna Pathak Shah; Heeba Shah; and Kenny Desai
Produced by Jairaj Patil
17 November 2022


Beastly Tales was billed as readings by the well-known performers, Naseeruddin Shah, Ratna Pathak Shah, Heeba Shah and Kenny Desai. Produced by Jairaj Patil for Motley, the heavily attended event included poems by Vikram Seth, from his book ‘Beastly Tales with stories by James Thurber’, TS Eliot’s poems from ‘Old Possum’s Book of Practical Cats’ and Robert Browning’s Legendary poem ‘Pied Piper of Hamelin’. The starkly designed presentation had no bells and whistles. Led by Naseeruddin Shah, the four performers stood behind their individual lecterns and read out the poems with a flair and perfect diction. Each one read their own piece individually and sometimes, in perfect synchronisation, in a chorus.

Spiced with humour, the content of the performance was deftly curated to reflect idiosyncrasies of contemporary times with follies and foibles of its people juxtaposed against an animal world which reminds you eerily of ‘Fables of Aesop’ and ‘Panchatantra’. The animals were near human too, but unlike the complexities we fallible folks suffer from, the cat, the lion, the tiger, the elephant, the owl were more focussed with a single idiosyncrasy each. This curious fact, along with the pulsating rhythm of the poetry delivered with a punch and an aplomb by the actors brought out the message of each piece with precision.

Let’s pick a few stanzas from here and there and see for ourselves the merriness of the mirth involved.

The Tortoise, in Vikram Seth’s poem, initially maintained the original story with who won the race thus:

“And the cheering of the crowd
Died at last, the tortoise bowed,
And he thought: “That silly hare!
So much for her charm and flair.
Now she’ll learn that sure and slow
Is the only way to go –
That you can’t rise to the top
With a skip, a jump, a hop”

But here comes the twist in Seth’s version, it is in fact the hare, who became the hero of the hour:

But it was in fact the hare,
With a calm insouciant air
Like an unrepentant bounder,
Who allured the pressmen round her.
“And Will Wolf, the great press lord
Filled a Gold cup — on a whim –
And with an inviting grin
Murmured: “In my eyes you win.”

Each of the selections had interesting, and sometimes mind blowing twists and turns, that be made you realise that, as in real life, in these fairy tales too you cannot take a happy ending for grantedFirst Published in IIC Diary Nov-Dec 2022

First Published in IIC Diary Nov-Dec 2022




Thespians honoured ceremoniously at Natsamrat Theater Awards 2023

Renowned Theatre Personalities of the country were honoured by Natsamrat. Like every year, this year also the 15th Natsamrat Theatre Award was organized, in which 12 theatre artists of the country were honoured by Natsamrat. Natsamrat’s director Shyam Kumar has always believed that it is a matter of pride for us to honour those who give their whole life to theatre.

This year the Best Writer Award was given to Dr. Harisuman Bisht, Best Director Satyabrata Rout, Best Actor Amit Saxena, Best Actress Rekha Johri, Best Backstage (Lighting) Souti Chakraborty, Best Critic Kamlesh Bhartiya, Theater Promoter Dayal Krishna Nath. Lifetime
Achievement Award was given to Daya Prakash Sinha, Dr.Jaidev Taneja, Diwan Singh Bajeli, R.K. Dhingra and Bharat Ratna Bhargava. All the honored personnel were given the Natsamrat Samman by Sh. R.K.Singh (former M.P.) and (Eminent Writer) Sh.Surendra Verma.

After the award ceremony the play Kadwa Sach was staged, by a troupe from Assam and the director of this play was Dayal Krishna Nath.

Mr. RK Sinha said that it is a big thing in itself that
an organization has been promoting this genre for 15 years and has been honoring the artistes, for this Natsamrat’s director Shyam Kumar deserves congratulations. Dr. Jaidev Taneja said that Shyam Kumar’s contribution to Hindi theater is commendable. The entire festival took place on 12 March 2023 at 6:30 pm at Muktdhara Auditorium, Gol Market, New Delhi and entry was free.