WHEN KAPIL’s DEVILS DETHRONED THE MIGHTY WEST INDIES

By Sunil Sarpal

It was 1983, the no-hopers or you may say the ‘under-dogs’ gave the all-crucial blow to West Indies cricket by beating them in one-dayers at Lords, England.

Before embarking upon the tournament at England, Indian Team did not expect any positive results from the World Cup. Their confidence level went a few notches up as the matches start unfolding. Early wins gave them the necessary confidence that they could also reach the play-offs. The confidence was given necessary boost by the captain Kapil Dev in a match against Zimbabwe when India was tottering with five top batsman having returned to the pavilion empty handed.

From then onwards, the pendlum shifted India’s way when Kapil Dev arrived on the crease. He scored 175 runs, which was considered to be the best ever innings played in a one dayer. It was a difficult wicket to bat on, but Kapil being a genuine all-rounder in the world shone with the bat and changed the course of the match. His was the inning which brighten up India’s stake to lift the trophy. Sunil Gavaskar admitted that in his life time he had not seen such an outstanding inning in one dayers, such was the master class of Kapil Dev as an explosive batsman. 4s and 6s rained from his blade in a magical show of batsmanship.
Unfortunately, the match could not be telecast on air due to technical hitches.

This inning was the turn-around of India’s fortune in the world cup. People still remember this inning with a sigh of relief. With this inning, Kapil Dev became an overnight hero in the tournament. Kapil leading from the front and his exploits percolated on his team mates and gave them unbelievable self-belief.

Interestingly, Indian Team had in their ranks the luxury of multi-skilled players.

MOHINDER AMARNATH : A top order batsman and a military medium swing bowler.
KAPIL DEV : A genuine all-rounder
BALVINDER SINGH SANDHU : A genuine swing bowler who could bat a bit also.
ROGER BINNY : A medium pacer who could chip in with some runs too.
MADAN LAL : A fine medium pacer who could bat as well.

In fact, India succeeded in reaching the final on the basis of these all round performers because English conditions suited their bowling the most.

The final between the mighty West Indies and the underdogs India was scheduled to be played in the Mecca of Cricket ie. Lords at England. But West Indies became over-confidant to lift upon being seeing that they are pitted up against the minnows India.

Batting first, India put up a paltry score of 180 odd runs on the board with Kris Srikant top scoring with 38 runs.

The first turning point of the match happened when Balvinder Singh Sandhu’s delivery pitching outside off stump swung in viciously, leaving Gordan Greenidge bowled and bamboozled. With this wicket in pocket, Indian Team looked pumped up. The drama started to unfold when a rampaging Viv Richards hit a skyer of a Madan Lal delivery and Kapil Dev took a catch of the match running backwards. This was perhaps the second turning point of the match. These two dismissals turned the tide in India’s favour.

Mohinder Amarnath’s military medium did most of the damage and wisely declared Man of the Match.

The no-hopers turned heros and World Champs under the captain cool Kapil Dev. Kapil Dev’s contribution was of immense value to the Team India. It was a herculean task for no-hopers but luck played a vital role for Team India. 1983 Indian Cricket Team members are written in golden letters in the history books.




आजादी की दीवानी दुर्गा भाभी

समीक्षा — अनिल गोयल

भारतवर्ष को अंग्रेजों के चंगुल से छुड़ाने के लिये एक लम्बा संघर्ष चला था. इस में अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी में बंगाल में हुए सन्यासियों के विद्रोह से ले कर 1947 तक के सभी सशस्त्र और अन्य संघर्ष सम्मिलित हैं. लगभग पौने दो सौ वर्ष तक चले उस लम्बे संघर्ष की कुछ घटनाओं के बारे में कहानी, उपन्यास इत्यादि लिखे गये. लेकिन इन का अधिकतर इतिहास छिपा ही रह गया. सन 2022 में स्वतन्त्रता के पिचहत्तर वर्ष पूरे होने के अवसर पर, ऐसे अनजाने, भुला दिये गये समरांगण-वीरों के बारे में जानकारी को साधारण जन तक पहुँचाने के लिये अनगिनत कार्यक्रम आयोजित किये गये. ऐसे ही प्रयासों में से एक रहा लेखक-निर्देशक अक्षयवर नाथ श्रीवास्तव का लिखा और मंचित किया गया नाटक ‘आजादी की दीवानी दुर्गा भाभी’.

दुर्गा भाभी के नाम से हम में से कौन परिचित नहीं है? भगत सिंह और चन्द्रशेखर आजाद इत्यादि के साथी रहे भगवती चरण वोहरा की पत्नी थीं दुर्गा भाभी या दुर्गावती देवी. एक रोचक परन्तु सत्य तथ्य है, कि इतने सारे क्रान्तिकारियों में से केवल भगवती चरण वोहरा ही विवाहित थे… शेष लगभग सभी अविवाहित ही थे! इतने सारे पिस्तौल और बम चलाने वाले उग्र क्रान्तिकारियों के बीच यह एक महिला कैसे रहती होगी, और वह भी उन परिस्थितियों में, जहाँ इन लोगों के काम की गोपनीयता के चलते उन्हें अपने घर के आसपास के लोगों के साथ सम्बन्ध बनाने की सुविधा तो नहीं ही रही होगी, यह अपने में एक रोचक कल्पना ही है, जिस पर किसी लेखन ने कुछ नहीं लिखा है!

लेकिन दुर्गा भाभी के जीवन के इस पक्ष का रहस्य सम्भवतः उन की पारिवारिक पृष्ठभूमि में छिपा होगा! प्रयागराज (इलाहाबाद) के शहजादपुर गाँव में पण्डित बांकेबिहारी के यहाँ जन्मी दुर्गावती के पिता कलैक्ट्रेट में नजीर थे, और दादा थानेदार थे, अतः पुलिस और प्रशासन के प्रति साधारण जन के मन में रहने वाला भय दुर्गा के मन में नहीं रहा होगा.

इन सब क्रान्तिकारियों में से भगवती चरण सब से अधिक आयु के थे. सत्ताईस वर्ष की आयु में उन की मृत्यु हो गई थी. दुर्गावती उस समय पर कुल बाईस वर्ष की अवस्था की थीं. इतनी कम आयु में विधवा हो गई दुर्गा भाभी ने अपना बाकी का जीवन भी स्वतन्त्रता के संघर्ष में भाग लेते हुए ही गुजारा. लेकिन वह जीवन कैसा रहा होगा, जिस में न सिर्फ उन के अपने पति, बल्कि एक-एक कर के उन के लगभग सभी प्रमुख साथी भी मारे गये थे? भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी हुई, चन्द्रशेखर अंग्रेजों से लड़ते हुए मारे गये, और भी सभी साथी या तो मारे गये, या फिर जेलों में गये या फिर भूमिगत हो कर रहते रहे. और यही नहीं, एक एकाकी जीवन जीने को मजबूर हुई दुर्गा भाभी और उन के बच रहे कुछ साथियों में से अधिकतर को स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद भी कोई सम्मान या पहचान भारत की सरकार ने नहीं दिया. ऐसे विकट जीवट वाली दुर्गा भाभी अकेली ही रहती रहीं, और दिल्ली के निकट गाजियाबाद में एक स्कूल चलाती रहीं, जहाँ अक्टूबर १९९९ में उन की मृत्यु हुई.

ऐसी साहसी महिला के जीवन पर नाटक लिख कर उसे मंचित करने का अनुकरणीय काम किया अक्षयवर नाथ श्रीवास्तव ने. जून २०२३ को इस नाटक का प्रदर्शन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के अभिमंच में देखने को मिला.

दुर्गावती के रूप में तनु पाल और भगतसिंह की भूमिका में शिवम सिंघल ने अपने अभिनय से बहुत अधिक प्रभावित किया. चन्द्रशेखर आजाद की भूमिका में आभास सिंह तथा अन्य भी सभी कलाकारों ने अपने दक्ष अभिनय से प्रभावित किया. लेकिन मुझे लगता है कि पुलिस इंस्पैक्टर और सी.आई.डी. इंस्पैक्टर के चरित्रों को इतना हास्यास्पद बना देने से नाटक की गम्भीरता प्रभावित हुई. ब्रिटिश राज की भारतीय पुलिस के नृशंस कृत्यों को कौन नहीं जानता… किस प्रकार से अपने अत्याचारों से उन्होंने क्रान्तिकारियों को परेशान किया था, यह हम सब को पता है. उन चरित्रों को मजाहिया बना देने से दर्शकों के मन पर होने वाला उन अत्याचारों का अनुभव कमजोर पड़ जाता है.

मंच परिकल्पना में भी कुछ परिवर्तन की आवश्यकता अनुभव होती है. मंच के बाएँ हाथ पर बनाये गये विशालकाय रेलवे स्टेशन का कोई विशेष प्रयोग नहीं हुआ, जब कि उस ने पूरे समय मंच के बड़े हिस्से को घेरे रखा. और जो पूरे नाटक में गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र था, भगवतीचरण वोहरा का घर, जिसे बाद में कलकत्ता के घर और अन्य स्थानों के रूप में भी प्रयोग किया गया, वह दबा-दबा सा रहा, जिससे पूरा प्ले-एरिया या अभिनय के लिये उपलब्ध स्थान एक कोने में सीमित हो कर रह गया. मंच पर गतिविधियों के विभिन्न स्थलों के बीच एक अनुपात बनाना पड़ता है, जिस का ध्यान न रखने के कारण यह नाटक उभर कर आ ही नहीं पाया. ऐसी ही समस्या प्रकाश-संयोजन के साथ भी रही, जिस में मंच का प्रकाश लगातार दर्शकों की आँखों पर पड़ कर दृश्यों की दृश्यव्यता को प्रभावित करता रहा. एल.ई.डी. पर्दे के आगे रखी एक लाईट तो पूरे नाटक में दर्शकों की आँखों में चुभती रही. आज के समय में मंच-आलोकन डिजाइनर का क्रीड़ा-स्थल अधिक बन गया है, नाटक के कथानक को दर्शकों तक पहुँचाने में सहायक होने का साधन कम रह गया है. नाटक की दर्शकों तक सम्प्रेषणीयता में बाधक बन रही इस प्रवृत्ति पर गम्भीरता से विचार करना होगा.

हरी सिंह खोलिया रूप-सज्जा के माहिर माने जाते हैं, और इस नाटक में की गई रूप-सज्जा से उन्होंने अपनी सिद्ध-हस्तता को एक बार फिर से स्थापित कर दिया. वस्त्र-विन्यास भी नाटक के अनुरूप ही था. एल.ई.डी. पर्दे का प्रयोग कर के इतने सारे स्थलों को मंच पर बनाने की समस्या का निर्देशक ने कुशलता से हल पा लिया. लगभग अठावन विभिन्न भूमिकाओं वाले इस नाटक में, इतनी अधिक संख्या में कलाकारों के मंच पर आने-जाने इत्यादि सभी चीजों को सम्भालना आसान नहीं होता. इस के लिये मंच-प्रबन्धन के लिये जिम्मेवार व्यक्ति की प्रशंसा करनी होगी, कि नाटक में कहीं कोई विशेष दर्शनीय चूक नजर नहीं आई! मंच पर दो कारों को ला कर घटना को जीवन्त बना देने के लिये अक्षयवर जी की प्रशंसा करनी होगी!

इतनी सारी घटनाओं को दो-ढाई घंटे के नाटक में समेटना आसान नहीं होता. फिर भी, नाटक के आलेख में कुछ चुस्ती लाने की आवश्यकता से इंकार नहीं किया जा सकता. अभी स्वतन्त्रता के संग्राम में अपने जीवन को होम देने वाले हजारों किस्से दबे पड़े हैं. आशा है कि इस नाटक को देख कर अन्य लोग भी अपने जीवन की आहुति देने वाले उन व्यक्तियों के बारे में नाटक बना कर इस यज्ञ में अपना योगदान देंगे.




पश्मीना – दर्द का रिश्ता

पश्मीना – दर्द का रिश्ता
अनिल गोयल

हिन्दी में नया नाट्य-लेखन बहुत कम हो रहा है. जब हिन्दी साहित्य के मठाधीश नाटक को साहित्य की विधा ही नहीं मानते, तो इस में बहुत आश्चर्य की बात भी नहीं है!

ऐसे में, अर्थशास्त्र के विद्यार्थी रहे एक कॉर्पोरेट एग्जीक्यूटिव के द्वारा नाटक लिखा जाना एक सुखद आश्चर्य है. दिल्ली विश्वविद्यालय के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से अर्थशास्त्र का अध्ययन, और फिर एम.बी.ए. करने वाले मृणाल माथुर स्कूल और कॉलेज में नाटक देखते और करते थे. शिक्षा पूरी होने के बाद बीस वर्षों तक जीवन विज्ञापन जगत में कॉर्पोरेट एग्जीक्यूटिव के रूप में चलता रहा, लेकिन रचनात्मक अभिव्यक्ति की ज्वाला अन्दर कहीं दबी रही.

आखिर, 2015 में कॉर्पोरेट जीवन की घिसीपिटी नीरस जिन्दगी से उकता कर मृणाल ने कॉर्पोरेट जगत के साथ नाता तोड़ कर स्वतन्त्र कार्य करना प्रारम्भ कर दिया. अब जब कुछ समय अपने लिये मिला, तो मृणाल अपने पहले प्यार नाटक की ओर को मुड़े, नाटकों के लेखक के रूप में. अपनी पुरानी डायरियों और नोट्स को झाड़ा-पोंछा, और अगले छः वर्षों में बारह नाटक लिख डाले!

2018 में अपना पहला पूर्णकालिक नाटक ‘पश्मीना’ मुम्बई में एक प्रतियोगिता में भेजा, तो वह प्रथम तीन में चुन लिया गया. उस नाटक का मंचन साजिदा साजी ने किया. इस के बाद लिखे नाटक ‘अकबर दी ग्रेट नहीं रहे’ को दिल्ली में व्यावसायिक रूप से रंगकर्म करने वाले प्रसिद्ध निर्देशक डॉ. एम. सईद आलम ने उठा लिया, और वह नाटक भी सफल हो गया! पहले दो नाटक सफल हो गये, तो लेखन ही जीवन हो गया! इस के बाद के बाकी नाटक भी कुछ छपे, कुछ छपने की प्रक्रिया में हैं.

कभी प्रोफेशनल लेखक नहीं रहे एक कॉर्पोरेट एग्जीक्यूटिव की नाटक लिखने के पीछे सोच क्या रही, इस प्रश्न के उत्तर में मृणाल बताते हैं कि पिछले लगभग पन्द्रह वर्षों में हमारे समाज में चीजों को केवल एक ही पक्ष की ओर से देखने और दूसरे दृष्टिकोण को पूर्णतया नकारने की जो प्रवृत्ति पनप गई है, उस के प्रति एक वितृष्णा मेरे नाटकों में देखने को मिलेगी. दोनों ही ओर की अच्छी और बुरी दोनों ही चीजों को देखना और दिखाना आज के वर्तमान समाज में और अधिक आवश्यक हो गया है, इसी चीज को अपने नाटकों के माध्यम से मृणाल ने रेखांकित किया है.

आज की चल रही सोच के उलट चलने की भावना क्यों जागृत हुई, उस पर मृणाल बोले, “आजकल नाटकों के निर्देशकों के द्वारा लेखकों को किनारे कर देने की जो प्रवृत्ति विकसित हुई है, जिस में लेखक की आवश्यकता को ही नकार दिया जाता है, ऐसे में रंगमंच में लेखक की आवश्यकता पहले से बहुत अधिक हो गई है. डिवाइज्ड या एक्सपैरिमैंटल नाटक के नाम पर लेखक को रंगमंच से बाहर कर दिया गया है, जिस से नाटक में पात्रों का अन्तर्द्वन्द्व उभर कर नहीं आ पाता… उस में केवल अपने ‘डिजाईन’ को दिखाने की होड़ ही नजर आती है. जिस कन्फ्लिक्ट को, मॉरल डाइलेमा को एक लेखक नाटक में लाता था, उसे एक निर्देशक, ड्रामाटर्ज या डिजाइनर नहीं ला सकता! लेखन एक बिल्कुल ही अलग विधा है!”

उन के द्वारा लिखित आठ नाटकों की नौ प्रस्तुतियों का आयोजन इवैन्ट मैनेजमैंट कम्पनी विब्ग्योर ने ‘नाट्यकुम्भ’ के रूप में दिल्ली के एल.टी.जी. रंगमण्डप में 4 से 11 जून 2023 तक किया. इस समारोह की पहली, और आखिरी प्रस्तुति भी नाटक ‘पश्मीना’ की रही, जिसे पहले दिन साजिदा साजी, और अन्तिम दिन वाले प्रयोग में जफर मोहिउद्दीन ने निर्देशित किया. बाकी सभी नाटकों का एक-एक ही प्रयोग रहा. अन्य नाटक थे, हास्य नाटक ‘अकबर दी ग्रेट नहीं रहे’, ‘दीदी आई.ए.एस.’ और ‘पाँच रुपैया बारह आना’, व्यंग्य ‘तीन तुम्हारी तरफ’ और ‘बिट्वीन यू एंड मी’, हिन्दी-अंग्रेजी नाटक ‘लाल किले का आखिरी मुकदमा’ और अंग्रेजी नाटक ‘गॉड्स लायनेस’, जिस की रीडिंग ही की गई. इन में से कुछ हिन्दी-अंग्रेजी में लिखे गये द्विभाषी नाटक हैं.

टेलीविजन की निरर्थक बहस के आज के युग में मृणाल माथुर अपने नाटकों के माध्यम से समकालीन घटनाओं पर मंथन करते नजर आते हैं. वे दर्शकों को मीडिया से मिलते उपदेशों या भेड़चाल का शिकार न होकर अपनी स्वयं की अन्तर्दृष्टि विकसित करने और अवधारणाओं के पीछे जा कर देखने को कहते हैं, उन्हें अपनी ही सोच और कल्पनाशीलता को उभारने का सन्देश देते हैं.

साजिदा साजी द्वारा निर्देशित नाटक ‘पश्मीना’ नाट्यकुम्भ’ का पहला नाटक था. पश्मीना – कश्मीर का ऊनी कपड़ा, जिस से शॉल, मफलर, कोट इत्यादि बनाये जाते हैं. जो ऊष्मा देता है. एक भावशून्य हो चुके जीवन में गति लाने के लिये भी ऊष्मा की आवश्यकता होती है. और पश्मीने और ऊष्मा के इसी सम्बन्ध को लेखक ने अपनी कलम के माध्यम से हम तक पहुँचाया है. इस नाटक में एक मध्यमवर्गीय दम्पत्ति अमर और विभा सक्सेना का बेटा, जो भारतीय सेना में सैनिक था, कुछ समय पूर्व कश्मीर में आतंकवाद की हिंसा का शिकार हुआ था. शहीद होने से पहले, घर आने पर वह अपनी माँ के लिये एक पश्मीने की शॉल लाना चाह रहा था, ऐसा उस ने अपने पत्र में लिखा था. बेटे की मौत से भावशून्य हो गई अपनी पत्नी के जीवन में ऊष्मा लाने के लिये उसी पश्मीना शॉल की खोज में अमर विभा के साथ कश्मीर जाता है. वहाँ उनकी भेंट एक युवा, उद्दाम, चंचल सिक्ख व्यापारी दम्पत्ति से हो जाती है. ये दोनों ही जोड़े पश्मीने की एक छोटी सी दुकान पर जाते हैं, जो लोग स्वयं ही पश्मीने का सामान बनाते हैं. वहाँ शॉल के भाव पर मोलतोल करते हुए दुकानदार के बेटे के भी एक आतंक-विरोधी ऑपरेशन में मारे जाने की बात पता चलती है. कश्मीर में आतंकवाद से उपजी हिंसा को बहुत बार दिखाया गया है. लेकिन सामान्य जन की व्यथा को दोनों ही ओर से एकांगी दृष्टि से ही देखा जाता रहा है. ऐसे में, दोनों पक्षों की पीड़ा को एक साथ दिखाने का यह अभिनव प्रयास ही इस नाटक को विशिष्टता प्रदान करता है.

नाटक का प्रमुख आकर्षण है नाटक के दो प्रमुख कलाकारों साजिदा साजी और जॉय मितई के भावपूर्ण अभिनय के क्षण… कैसे अपने बेटे को कश्मीर के आतंकवाद की हिंसा में गँवा बैठा यह प्रौढ़ दम्पत्ति दर्द की विभिन्न परतों के बीच से गुजरता, उन के बीच एक सूक्ष्म सन्तुलन बनाता हुआ, अपनी भावनाओं पर नियन्त्रण पाने का सफल-असफल सा प्रयास करता, कश्मीर की यात्रा करते हुए अपने जीवन के कुछ अत्यन्त संवेदनशील क्षणों को जीता है. सबसे कारुणिक और संवेदनशील क्षण वे हैं, जब अमर और विभा को शॉल वाले के बेटे के बारे में पता चलता है! शॉल के साथ-साथ जो चीज इस दम्पत्ति को दुकानदार के साथ जोड़ती है, वह है अपने बेटे को खो देने की व्यथा! इस प्रकार का दर्द का सम्बन्ध दर्शकों को दो विपरीत धुरियों पर खड़े इन दोनों परिवारों की व्यथा के द्वारा कश्मीर-समस्या को एक सन्तुलित दृष्टि से देखने को प्रेरित करता है. इस प्रौढ़ माता-पिता और दुकानदार दोनों के ही दर्द एक जैसे हैं, जिस के कारण ये दोनों किसी एक स्तर पर जुड़े हुए भी हैं, जहाँ कोई भी अन्य बाहरी तत्व प्रवेश नहीं कर पाता है – साजिदा और जॉय ने जिस काव्यात्मक कोमलता के साथ, गैर-शाब्दिकता के साथ इन क्षणों को मंच पर जिया है, वह दिल्ली के रंगमंच में आज एक बहुत दुर्लभ चीज है, और वही इस नाटक को दर्शनीय बनाता है.

साजिदा इस नाटक को अभिनेता का नाटक मानती है… जहाँ निर्देशक और मंच पर अन्य सब कुछ भी गौण हो जाता है… केवल अभिनेताओं के द्वारा प्रेषित की जाने वाली संवेदनाएँ, और उन्हें अपनी आँखों और कानों से ग्रहण करते दर्शक ही प्रेक्षाग्रह में रह जाते हैं. और उसी तरीके से साजिदा ने इस नाटक को प्रस्तुत भी किया है… सैट के नाम पर केवल दरवाजों के तीन चौखटे बना दिये गये हैं, जो एक से दूसरे स्थान पर स्थानान्तरित होने का भी प्रतीक हैं, और जिन पर टंगी कपड़े की लम्बी पट्टियों को पश्मीने की दुकान में शालों के रूप में भी प्रयोग कर लिया गया है. मेकअप और किन्हीं विशिष्ट परिधानों की भी आवश्यकता नहीं अनुभव की गई, न ही इस नाटक की गम्भीर बात को कहने के लिये किसी विशेष प्रकाश-व्यवस्था की आवश्यकता हुई. साजिदा को लगा कि इस नाटक में युद्ध की समस्या को एक अलग दृष्टि से देखा गया है, और युद्ध की त्रासदी को बिना कोई बेचारगी का भाव उत्पन्न किये, बिना रोये-धोये, अपनी बात कह दी गई है. किसी अपने के चले जाने के दर्द के क्षण में आदमी सुन्न हो जाता है… इस नाटक में वही क्षण लगातार उपस्थित रहे… जब इन कलाकारों ने कथा के पात्रों के दर्द को केवल अपने अभिनय के द्वारा दर्शकों तक पहुँचा दिया. एक अच्छे नाटक की यही सब से बड़ी खूबी होती है.

साजिदा और जॉय राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षण ले कर दिल्ली में नाटक कर रहे हैं… गम्भीरता से, और लगातार, अपनी संस्था ट्रैजर आर्ट एसोसिएशन के माध्यम से. नौटंकी में इन के द्वारा किया गया एक सुन्दर प्रयोग कुछ वर्ष पूर्व मैंने देखा था. अपने चुने हुए व्यवसाय के प्रति पूर्ण निष्ठा और समर्पण ही इस जोड़े के काम को एक अलग महक देता है.

नाटक में सिक्ख जोड़े की भूमिका मोहम्मद शाहनवाज और रितु ने निभाई. दुकानदार की भूमिका में केयूर नन्दानिया थे, उस के बेटे की भूमिका में सूरज और बेटी की भूमिका में रिया पवार थीं. अमर और विभा के बेटे के रूप में थे सैफ सिद्दीकी, और डॉ. कौल की भूमिका अवनीश झा ने निभाई.
(चित्र सौजन्य: साजिदा साजी)




WTC Final: India had to be content being a runners-up as Australia steals the show

Image courtesy Twitter

By Sunil Sarpal

The WTC final cricket test match played between India and Australia at The Oval, England was a mouth-watering contest. There was juice on offer for fast bowlers and life for batters was not a cake-walk at all. Indian fast bowlers did not bowl at the right areas in the first outing, enabling Aussies to take early initiative and advantage in the match. Aussies amassed a mammoth 479 in the first innings. It was a daunting task for India to take on 4-pronged pace attack of Australia. Of the 4, Boland was the most difficult to deal with. The first innings scalp of Gill by Boland was a treat to watch. The ball pitched well outside the off stump but jagged back and uprooted the stumps.

One particular noticiable factor was when once a batsman settles down after gauging the behaviour of the pitch, it becomes imperative on his part to play a disciplined knock and not over-indulge. Once india is in a precarious situation, batters going for expensive shots leads to their downfall. The most difficult corridor for a batsman is off stump and just outside off stump. Generally, it is the away going delivery which creates trouble for batters but when bowlers swing one in, it is absolutely nightmarish for the batters.

Batting on helpful tracks for batters call for a great deal of concentration, determination and application.

In the second essay, Indian batters Rohit, Pujara and Kohli all perished after making good start and making necessary adjustment.

For Aussie fast bowlers above 6 ft plus height get extra ordinary lift and bounce from the wicket. All Aussie fast bowlers are above 6 ft.

If we talk about Rohit Sharma’s batting, his batting involves lot of risk-taking shots. Pulls and hooks are his favourite shots but controlling these shots is equally important. He may get a lot of runs playing such shots but there is an element of risk involved. Anything misqued goes to waiting hands.

I think Gill has to make lot of adjustment in playing outside off stump line.

Pujara these days has changed his style of play. He need not be over enthusiastic in playing shots. Pujara of old was much more secure and stood like a wall for other batters to score bulk of runs.

In this match, India badly missed the services of Bumrah because of injury. For India it was a testing time but Aussie is a class act. Let us hope with the recovery of Pant, India poses more solidarity to the side in the future.




CSK vs GT – a thrilling, nail-biting IPL final, down to the last ball

By Sunil Sarpal

Chennai Super Kings (CSK) led by MS Dhoni and Gujarat Titans (GT) led by Hardik Pandya were pitted against each other to play for IPL 2023 Final. The venue of the match was Ahmedabad but the match on Sunday was washed out due to incessant rain and re-scheduled for play on Monday.

It was a belter of a pitch but for initial seam movement that provided little spin.

Dhoni, after winning the toss elected to bowl first, considering that in the event of intervening rain, the contest shall be reduced in target and number of overs. It will benefit the team batting second. In the ultimate analysis his prediction proved right and CSK lifted the IPL 2023 trophy for the 5th time.

A few salient features emerged from the match. They are enumerated below :-

1) The stumping effected by Dhoni of in-form Shubham Gill off the bowling of Ravinder Jadeja was a mercurial work behind the stump. Mind you Gill notched up 3 centuries on the trot before this match. and was a hot favourite facilitating GT to lift the trophy.

2) For Gujarat Titans the stand-out performers with the bat were Sai Sudershan and Saha. They both batted brilliantly and posted a formidable total of 200 +.

3) With the intervention of, rain after the first inning, the contest was limited by a reduction in overs and scaling down of the target.

4) The relatively disappointing factor was that the match could not be decided in a 20-over contest.

5) Even though MS Dhoni was not fully fit and one of his knees not taking the rigorous of running between the wicket, he has not called it quit from IPL and shall appear in the next year’s IPL too for CSK.

In conclusion, as per the post tournament analysis, some of the batters have performed exceptionally well.

1) To start with, Shubham Gill has notched up three tons.

2) Followed by Virat Kohli who posted two back to back hundreds with a fifty.

3) Batters like Ishan Kishan, Nitish Rana, Rinku Singh and Surya Kr Yadav stole the show exhibiting T-20 style of shots. They redefined the game of cricket by introducing the formula – throwing caution to the wind.

WHAT A TOURNAMENT CALLED IPL




Natsamrat Theatre Festival spreads its wings to Mumbai

By Shraboni Saha

After establishing itself in Delhi, Natsamrat is now steadily making a mark in Mumbai as well. It successfully organised the 3rd Mumbai Theater Festival for Maharashtra audience

Natsamrat brought the Kumbh of plays for Mumbaikars i.e. 3rd Mumbai Theater Festival where five different plays were staged on May 26, 27 and 28 at Creative Adda Auditorium, Versova, Andheri West, Mumbai.

On May 26, at 6:30 pm, the play Napunsak, written by Manjul Bhardwaj, was staged and at 8:00 pm, the play Teen Bandar, written by Prabuddha Joshi, directed by Nagendra Kumar Sharma, both plays were staged.

The play Aadhi Raat ke Baad which was written by Dr. Shankar Shesh was staged on 27th May at 6:30 pm and the play Chukayenge Nahi, written by Dario-Fo and adapted by Amitabh Srivastava was staged at 8:00 pm and both the plays are directed by Chandrashekhar Sharma.

On May 28, at 7:30 pm, the play Kambakkht Ishq written by Satya Prakash was staged and the play is directed by Shyam Kumar, director of Natsamrat.

Artists from Delhi, Ambala, Mumbai presented the five different plays at the theater in Mumbai. In these plays, there was humor, adventure as well as social messages for the audience. Seeing the audience of Mumbai, it seemed as if they had a lot of love for theatre, that’s why the entire auditorium was packed on all three days. Natsamrat director Shyam Kumar says that if anyone wants to give something to the society, it can be done through drama and the audience definitely pays attention to it because it does not give stress to the mind, instead it gives a beautiful message through entertainment.




ALSO RAN: VIRAT KOHLI – IN THE PINK OF FORM

by Sunil Sarpal

Virat Kohli

As we approach the final today, in the on-going IPL season, Virat Kohli belted out back  to back centuries for his franchisee RCB.  Virat stole the show but unfortunately his team RCB could not even find a place in the play-offs.  Kohli leaves a solid impact on his followers with the kind of flourish seen in his knocks.  He plays conventional cricketing shots all over the park in a commanding fashion that bowlers are left clueless where to pitch the ball and where not.  

The behaviour of the pitch on which match is played plays a pivotal role in batting performance.  

    Indian pitches generally are spin friendly.  

    In Australia the bounce is waist high. 

    In England, the conditions provide more swing.  

    In New Zealand, there is more lift from the surface and swing too.

    In West Indies, the pitches provide low bounce and are on the slow side.  

A batsman needs to adjust to conditions first and plan which shot should be played and which not.  

Kohli with 76 International tons in his pocket in all formats has enormous experience and exposure to any given condition.  He therefore is the backbone of Indian batting and other just revolve around him.  Dislodging him therefore becomes next to impossible.  He stands tall among his contemporaries.  

People and his die-hard foes becomes so critical about his inclusion in the side when he goes thru patchy and lean periods.  They immediately write him off but Kohli has in him to bounce back with vengeance.  

Kohli proclaims; “As long as God so desires, I shall keep on playing for India.  

He is a modern-day iconic figure and others just want to emulate his work ethics.  

He stands tall among the legendary figures India has produced so far.  

If he remains fit and rarin-to-go,  he will set such high benchmarks that he will be hard to dislodge.  

Virus-free.www.avg.com




A Halla Gulla called IPL

By Sunil Sarpal

Indian Premier League will soon draw to a close for this season. Let’s see what the Halla Gulla called IPL was all about

It happens once in a calender year and bring lot of fun and joy to cricket world. On every TV set in a home, this tussel between bat and ball is fought, providing great entertainment to the viewers of the game. The game is also a reminder that it belongs to young legs. Ageing has no room in this game which is on a fast lane.

Often viewers remember those that are no more, but were star cricketers during their playing days.
Dean Jones, Aussie
Malcom Marshal, WI
Martin Crow, NZ
Alas, cruel death ended their journey mid-way, depriving followers of their incredible presence and charisma.

IPL pays an astronomical amount of money to the players – thanks to IPL franchisees. On the basis of players’ performance over a period of time, they are auctioned by franchisees at huge amounts. Even after the auctioned player loses his touch and his performance dips, he remains on the bench and still paid the committed amount.

It has become a joy to watch IPL matches because music is played in the background. It is full entertainment. These days commentators provide lot of stories, past experiences and also discuss spats between players. Such things bind the viewers to TV sets.

Young guns join shoulders with foreign players and get lot of international experience. Players like Nitish Rana, Ishaan Kishan and Rinku Singh are the stars in making. Cricket is in the blood of followers and they enjoy this soap opera much more than Saas and Bahu episodes on TV.




WHAT MORE CAN YOU ACHIEVE IN SPORTS ?

By Sunil Sarpal

God comes to bat for India at No. 4, said Mathew Hayden for Sachin Tendulkar

Sometimes somebody’s achievements surpass all records and record books. That person becomes immortal during lifetime.

Be it Sachin Tendulkar in Cricket

or Mike Tyson in Boxing

or Maradona in Football

They are living legends in their chosen sport. Though they have retired from their sport, but they are remembered with ‘awe’ coming from the heart.

They are simply human being like others but they have ‘Gift of the Gall from God’. Otherwise, they would not have achieved what they did. Their names are written with Golden letters. They always receive Red Carpet Welcome. Stadiums (stands) are named as Sachin Tendulkar Stand. Academies are run on their names.

People chant their names and worship for their success.

West Indies legend Brian Lara has named his son as Sachin.

In football, Maradona beat all defenders single-handedly and scored too a goal in a World Cup match.

Mike Tyson’s ability to knock down any boxer with one strike in any International match. Absolutely unbelievable feat.

They lived, they ruled and they scripted the history books. In fact, they have re-written the history books. Their brilliance in their craft left the game gasping for breath. They took the game to altogether different and unexplored height and level.

Sachin Tendulkar from the sound of ball hitting his bat, could determine whether he is in-form or not.

God has created man in his own image but some of them over-whelmingly different and unique from the rest.

SALUTE TO THEM.




Australia vs India at Wankhade Stadium Rahul and Jadeja rule the pitch

By Sunil Sarpal

Rahul and Jadeja seal victory for India

Yesterday’s encounter, on 17th March 2023, between visiting Australia vs India at Wankhade Stadium proved a nightmare for the batters. It was a day-night one- day match. Australia upon winning the toss chose to make the first use of the pitch and elected to bat first. There was help on offer for the fast bowlers. The ball was moving in the air and off the pitch too. There is a saying – when the going gets tough, the tough gets going. For Mitchel Marsh who was an in-form batsman from Australia, the batting was to his liking. He hit some huge sixes and dominated the proceedings with his power hitting. On the other end, batters were struggling to cope up with movement. It was the golden arm of Ravinder Jadeja who undid the proceeding and took Marsh’s scalp. There was no other batsman who could settle down to post a formidable score on the board. Jadeja’s made his presence felt in fielding when he took a diving catch and stalled the proceedings. Australia could post a paltry score of 188 runs in a 50 over encounter. Shami and Siraj were among the wickets. Jadeja too was economical and restrictive in bowling. His line and length were spot on and did not allow Aussis to freeze arm.

Indian batting started on a dismal note when the opener Ishan Kishan perished early to Mitchel Starc LBW. Kohli too was in all sorts of trouble against the moving ball and was not at all in his elements. He too perished early leaving Gill and Rahul to steady the ship. There were chances on offer in the slip cordon but Gill was lucky to survive and played some trade mark shots. He too could not trouble score board much and lost his scalp scoring just 20 runs. Surya came and left on the first ball, LBW to Starc – the most successful bowler from Australia.

Both Rahul and Jadeja provided stability to Indian innings. Both played disciplined knocks and took the Indian side to victory.

By no yardstick the pitch offered a run feast required in a 50 over encounter. It was a fast bowlers paradise. KL Rahul’s grit and unflinching determination in the company of Jadeja proved handful for India and won the match for India. All credit for this win should go to the duo.

Lastly one thing I like to mention that Jadeja’s graph as a genuine all- rounder – be it bowling spin, batting, especially fielding and catching is commendable. Although Rahul’s discipline and score deserves man-of the match award but Jadeja’s brilliance in all walks of the game deserve standing ovation from the followers of the game. Somebody even compared him to the legend Sir Gary Sobers.