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Last day for receiving applications for a new Cricket Selection Committee

By Sunil Sarpal

After the ignominious exit from ICC T-20 tournament at the hands of England, Indian Cricket Team’s prestige was at stake. In order to save it’s face, BCCI had no other option but to sack the Selection Committee, led by Chetan Sharma. Even the BCCI President Saurav Ganguly was earlier shown the exit door.

The new BCCI President is Roger Binny, a former cricketer. And the process of forming the new Selection Committee has been under-way. It has become a norm in India that whenever Indian Team is defeated in a big tournament, changes and chopping of heads takes place.

The deadline to submit applications for the post of new selectors ends today, november 28th. According to InsideSports, BCCI is reported to have already received over 80 applications for vacancy of five selectors. The board will scrutinise the applications and will make announcement of the new selection committee in December 2022.

It is speculated that, some of the new faces such as, Shubham Gill, Prithvi Shah, Sanju Samson and Hooda may get the nod. In the bowling department too the return of Jasprit Bumrah will boost the already formidable bowling attack.

Ravi Shastri down the memory lane

If we talk about going down the memory lane, when Ravi Shastri was removed from the position of a Director, Team India, after his 2- term tenure, the team was performing very well except for out of form Virat Kohli. Ravi possesses the right ingredients and knowledge, about how to deal with the boys, which is a rare quality to lift the spirit of the game. Therefore, there are voices demanding for his return as Director, Team India. Whereas, Rahul Dravid’s tenure as Coach has not brought the positive results because coaching Team India is a different ball game. Whereas, Ravi’s invaluable inputs to India captain, time to time intervention in matter of significance and foresight were some of the qualities rarely found in a person.

Rahul Dravid and MS Dhoni

With the induction of Roger Binny as new BCCI President, it is reported that his first call was to include MS Dhoni as Head Coach or Director, Team India T20. MS Dhoni is immensely talented, cool as a cucumber and his skills for man-management are extra-ordinary. It is hoped that MS Dhoni, if appointed, as Director, in coordination with Rahul Dravid as coach will do the best for the team, which takes Team India forward.

Time is ripe to include new legs because the demand of the game is to be fast and ferocious. Surya Kumar Yadav has proved time and again that the shorter version of the game’s demand is 360 degree. It is therefore absolutely necessary on the part of New Selection Committee to re-build the side and to not go by past reputation of the players.




हरियाणवी संस्कृति का एक नया अध्याय

लेखक – अनिल गोयल

1968 में बनी पहली फिल्म ‘धरती’ से होता हुआ हरियाणवी फिल्म उद्योग ‘चंद्रावल’ (1984) और ‘लाडो बसन्ती’ से होता हुआ आज ‘दादा लखमी चन्द’ तक आ पहुँचा है। इस बीच अश्विनी चौधरी की फिल्म ‘लाडो’ (2000) ने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता, और इसके चौदह साल बाद राजीव भाटिया की हरियाणवी फिल्म ‘पगड़ी दि आनर’ (2014) ने तो दो-दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त किये! ‘दादा लखमी’ क्षेत्रीय फिल्मों की श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी है। इसने साठ से भी अधिक अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार जीते हैं। फ्रांस के प्रतिष्ठित कान फिल्म समारोह के फिल्म बाजार में दिखाई जानेवाली ‘दादा लखमी’ सच्चे अर्थों में एक ऐसे सिनेमाई मुहावरे को गढ़ती है, जहाँ से हरियाणवी फिल्मों के लिये अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के द्वार खुल सकते हैं। हरियाणा की पारम्परिक लोकनाट्य विधा ‘सांग’ इसकी क्षमता रखती है। आमजनों की अपनी सहज भाषा में सहज जीवन के वात्सल्य से लेकर देशभक्ति, इतिहास, दर्शन और पौराणिकता तक का ज्ञान आमजन तक इन सांगों के माध्यम से पहुँचता रहा है।

लोक-परम्परा की इसी कड़ी में, हरियाणा के सूर्यकवि लखमी चन्द के सांग पिछली लगभग एक शताब्दी में हरियाणा के सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में स्थापित रहे हैं। उन्हें “हरियाणा का कालिदास” भी कहा जाता है। उनका बचपन बहुत अभावों में बीता! केवल अठारह-उन्नीस वर्ष की आयु में ही लखमी चन्द ने अपने गुरुभाई जैलाल नदीपुर माजरावाले के साथ मिलकर साँग मंचित करने के लिये अपना अलग बेड़ा बनाया। उनकी प्रतिभा ने एक वर्ष के अन्दर ही उनके बेड़े को लोगों के बीच स्थापित कर दिया था। कुल बयालीस वर्ष की आयु तक ही जीवित रहे लखमी चन्द ने लगभग दो दर्जन सांगों की रचना की। शीघ्र ही पण्डित लखमी चन्द ‘साँग-सम्राट’ के रूप में विख्यात हो गये। वे कट्टर अनुशासन-प्रिय व्यक्ति थे। उनके बेड़े में हरियाणा के उत्तम से उत्तम कलाकार भी सम्मिलित होना चाहते थे। उन्होंने साँग की कला को उन ऊँचाईयों तक पहुंचा दिया, जिसका मुकाबला आज तक भी कोई और व्यक्ति नहीं कर पाया है।

इन्हीं सूर्यकवि पण्डित लखमी चन्द पर हरियाणा के अभिनेता-निर्माता-निर्देशक यशपाल शर्मा ने ‘दादा लखमी चन्द’ फिल्म बनाई है. इसमें यशपाल शर्मा, मेघना मालिक, राजेन्द्र गुप्ता, आदि ने मुख्य भूमिकाएँ निभाई हैं। फिल्म में लखमी चन्द के बचपन की भूमिका में योगेश वत्स, और युवावस्था की भूमिका में हितेश शर्मा ने बहुत सशक्त अभिनय किया है। योगेश वत्स ने सुन्दर अभिनय करने के साथ-साथ इस फिल्म में गाने भी गाये हैं, जिसके मधुर गायन ने दर्शकों को बहुत आकर्षित किया. युवा लखमी की भूमिका निभा रहे हितेश का गायन और सांगी की भूमिका करते समय उनका नर्तन और अभिनय दर्शकों को लगातार बाँधे रखता है।

बहुत बार देखा गया है कि कोई अभिनेता-निर्देशक अपने को ही फिल्म के ऊपर हावी हो जाने देता है। लेकिन यशपाल शर्मा ने अपने को इससे बचाये रखा है। प्रारम्भ में कुछ समय को छोड़ कर बाकी की फिल्म में वे परदे से गायब हो जाते हैं।

लखमी के बाल्यकाल और किशोरावस्था की भूमिकाओं में भी अन्य कलाकार नजर आते हैं। लेकिन इन सब के ऊपर, अभिनय के आधार पर इस फिल्म को मेघना मलिक की फिल्म कहा जा सकता है। यशपाल शर्मा ने जिस प्रकार से मेघना मलिक के माध्यम से एक माँ के हृदय की वेदना को उभारा है, वह अतुलनीय है। मेघना की हरियाणवी भाषा में संवादों की अदायगी इतनी प्रभावशाली है, कि उनके बोलते समय पर पिक्चर-हॉल में सन्नाटा पसर जाता है; विशेषकर वह प्रसंग अत्यन्त मार्मिक बन पड़ा, जब तीसरी-चौथी बार लखमी के घर से भाग जाने पर वह थक कर कहती है, ‘इसे जाने दो।।।’ कैसे एक माँ अपने उद्दण्ड बेटे से हार जाती है, और ना चाह कर भी, मजबूरी में उसके घर से चले जाने को स्वीकार कर लेती है!

यह फिल्म यशपाल शर्मा की छः वर्षों की मेहनत का फल है। इसमें रागनी-गायन एकदम ठेठ देसी है, जो सीधा दिल में उतर जाता है। फिल्म की असली जान ही है उसका संगीत, जिसके द्वारा लखमी चन्द के सांग दिखाये गये हैं। एक कवि और सांगी की कहानी सुना कर यह पिक्चर फिल्म-निर्माण के क्षेत्र में एक नई राह दिखा रही है। उत्तम सिंह द्वारा तैयार किया इस फिल्म का उत्तम संगीत भारत की इस फिल्म को ऐमी अवार्ड दिलवाने की क्षमता रखता है।

बहुत समय के बाद परिवार के साथ बैठ कर देख सकने योग्य साफ-सुथरी फिल्म आई है। रवीन्द्र सिंह राजावत और यशपाल शर्मा द्वारा निर्मित इस लघु बजट की हरियाणवी फिल्म में समाज में पारिवारिक मूल्यों को पुनर्स्थापित करने की शक्ति है… इसे देख कर गाँव के सहज, सरल जीवन की ओर को वापसी का विचार मन में आता है। यह बच्चों को भी दिखाने योग्य फिल्म है, ताकि आधुनिकता की दौड़ में अन्धी होती हरियाणवी संस्कृति को पुनर्जीवन मिले।
यह फिल्म हरियाणवी फिल्मों को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने का दम रखती है। फिल्म देखते हुए कई बार हॉल में व्याप्त सन्नाटे से दर्शकों के रोंगटे खड़े होने का आभास होता था। इस फिल्म ने हरियाणवी रागिनी और सिनेमा, दोनों को जिन्दा कर दिया। फिल्म के एक-एक दृश्य में हरियाणा के ग्रामीण जीवन और संस्कृति दिखाई देते हैं। जिस प्रकार बाहुबली और आर.आर.आर. जैसी अरबों रूपये के बजट वाली दक्षिण भारतीय/क्षेत्रीय फिल्मों ने भारतीय फिल्म इंडस्ट्री को एक नई दिशा दी, वही काम आज ‘दादा लखमी चन्द’ जैसी एक छोटी सी, कम खर्चे की फिल्म कर रही है।

यह फिल्म पण्डित लखमी चन्द के जीवन का पहला भाग दर्शाती है। बाकी जीवन-चरित जानने के लिये फिल्म के दूसरे भाग की दर्शकों को प्रतीक्षा रहेगी।




प्रेम रामायण

लेखक: अनिल गोयल

महरषि वाल्मीकि की रामायण ने पिछले लगभग सात-आठ हजार वर्षों में कितने ही रूप धारे हैं. हर काल में वाल्मीकि–रचित इस महाकाव्य को हर कोई अपने तरीके से सुनाता चला आया है. इसकी मंच-प्रस्तुतियों ने भी शास्त्रीय से लेकर लोक-मानस तक हजारों रंग भरे हैं. पारसी शैली की रामलीला को देख कर भारत की कितनी ही पीढ़ियाँ भगवान राम की इस कथा को मन में धारती आई हैं. कुमाँऊँनी रामलीला से लेकर कोटा क्षेत्र के पातोंदा गाँव, ओड़ीसा की लंकापोड़ी रामलीला और हरियाणा में खेली जाने वाली सरदार यशवन्तसिंह वर्मा टोहानवी की रामलीला जैसी कितनी ही सांगीतिक रामलीलाओं की लम्बी परम्परा हमारे यहाँ है. भारत ही नहीं, विदेशों में भी इसकी अनेकों प्रस्तुति-शैलियाँ पाई जाती हैं. इंडोनेशिया में बाली की रामलीला की तो अपनी अलग ही मनोहर शैली है.

हमारे देश में भी कलाकार रामलीला को अपनी दृष्टि से मंच पर प्रस्तुत करने के नित नये तरीके और शैलियाँ ढूँढ़ते रहते हैं. प्रवीण लेखक, निर्देशक और निर्माता अतुल सत्य कौशिक ने, जो प्रशिक्षण से एक चार्टर्ड अकाउंटेंट और अधिवक्ता हैं, अपने नाटक ‘प्रेम रामायण’ में प्रेम की दृष्टि से इस महाकाव्य की विवेचना की है. रामायण की अपनी व्याख्या पर आधारित नाटक ‘प्रेम रामायण’ का प्रदर्शन अतुल ने 5 अक्टूबर 2022 को दिल्ली के कमानी प्रेक्षागृह में किया. उनकी इस नाटक की यह पच्चीसवीं या छब्बीसवीं प्रस्तुति थी, जोकि हिन्दी रंगमंच के लिये एक गर्व का विषय है.

हमारे यहाँ प्रेम-भाव का प्रयोग प्रायः कृष्ण-कथाओं की प्रेम-मार्गी प्रस्तुतियों में किया जाता है. परन्तु अतुल ने बाल्मीकि की रामायण के मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के जीवन पर आधारित रामायण को प्रेम के भाव की प्रस्तुति का माध्यम बनाया है, जहाँ रामायण के चरित्र ईश्वरीय अवतार होने के साथ-साथ अपने मानवीय रूप, स्वभाव और संवेदनाओं के संग नजर आते हैं.

Atul Satya Kaushik

इसकी प्रेरणा उन्हें कैसे मिली, इसके उत्तर में वे कहते हैं, “मैं किसी एक प्रोजैक्ट के लिये बाल्मीकि रामायण पढ़ रहा था, और क्रौंच-वध के प्रसंग को पढ़ते हुए मुझे लगा कि इस महाकाव्य की उत्पत्ति तो एक प्रेम-आख्यान से हुई है. तो रामायण की विभिन्न कथाओं में प्रेम को ढूँढ़ने की प्रेरणा मुझे इसी आदि-काव्य से मिली!”
इसके लिये उन्होंने रामायण में छुपी पाँच प्रेम-कथाओं को चुना है. प्रेम-कथाओं के इन पन्नों में से सबसे पहले वे एक लगभग अनजानी सी कहानी ‘अकाल’ ले कर आते हैं, जिसमें श्रीराम की बड़ी बहन, दशरथ और कौशल्या की पुत्री शान्ता और उनके पति ऋषि श्रृंगी या ऋष्यश्रृंग की कहानी दिखाई गई है. दूसरी कहानी ‘रथ से निकला पहिया’ कैकेयी और दशरथ की जानी-पहचानी कहानी है. तीसरी कहानी ‘स्वर और शान्ति’ में वे सीता और राम के मन की संवेदनाओं की कथा सुनाते हैं. इसके बाद ‘उल्टी करवट मत सोना’ में लक्ष्मण और उर्मिला की कहानी देखने को मिलती है. और अन्त में, ‘उस पार’ के माध्यम से सुलोचना और मेघनाद की करुण प्रेम-कथा के दर्शन होते हैं.

विरह या अपने प्रिय से अलगाव ही प्रायः प्रेम-आख्यानों का आधार रहता है. इन पाँच में से शान्ता की कहानी के अतिरिक्त अन्य सभी चार कहानियाँ अपने-अपने कारणों से जन्मे उसी विरह की वेदना को दर्शाती हैं. सभी कहानियों में स्त्री-मन की अथाह गहराइयों को दर्शाने का प्रयास स्पष्ट नजर आता है, जिसके लिये अतुल कभी-कभी इन कथाओं की अपने अनुसार विवेचना भी कर लेते हैं.

दशरथ के मित्र और अंगदेश के स्वामी राजा रोमपद ने शान्ता को पाला था. युवा होने के उपरान्त परिस्थितियोंवश एक बार शान्ता का सामना ऋषि श्रृंगी या ऋष्यश्रृंग से हुआ. ऋष्यश्रृंग ने अपने पिता विभान्तक या विभंडक के क्रोध से शान्ता की रक्षा की, और उसी क्षण शान्ता ऋष्यश्रृंग की हो गई! (इन ऋषि विभंडक के नाम पर ही आज का मध्य प्रदेश का भिंड नगर बसा हुआ है!) ऋष्यश्रृंग ने भी जीवन के हर क्षण में शान्ता को अपने साथ रखा, उसे पूरी बराबरी का सम्मान दिया! शान्ता के जीवन के उन्हीं क्षणों का चित्रण अतुल ने पूरी कुशलता के साथ किया है.

‘स्वर और शान्ति’ में अतुल ने सीता और राम के मन की ध्वनि को एक अनूठे ही तरीके से सुनाया है. अतुल की सीता अयोध्या की सीता नहीं हैं, वे मिथिला की बेटी सीता हैं, मन से एक चंचल बालिका, सुकोमल भावनाओं से ओत-प्रोत, कर्तव्यों के गाम्भीर्य के बीच अपने मन की संवेदनाओं के कोमल स्वरों को भी सुनने वाली सीता. अयोध्या के राम जितने शान्त थे, मिथिला की सीता उतनी ही चपल और चंचल थीं. आज भी मिथिला और नेपाल के गीतों में उनका यही रूप अधिक प्रचलित है, जनकपुर की बेटी का रूप! राम का स्वरुप भी यहाँ अयोध्या के युवराज का नहीं, बल्कि मिथिला के जामाता का है, जिसके साथ ठिठोली भी की जाती है! सीता के इसी स्वर, और राम के गहन-गम्भीर, शान्त स्वभाव की कथा है यह कथा! यह प्रेम रामायण है, तो उसमें अतुल ने कलात्मक स्वतन्त्रता लेकर सीता की प्रचलित एकदम गम्भीर, आदर्श छवि से हट कर, सीता को अपने पिता की लाडली बेटी, एक बच्ची के रूप में दिखाने का प्रयास किया है!

लेकिन पूरे नाटक में सबसे अधिक मार्मिक और करुणा भरे क्षण रहे लक्ष्मण और उर्मिला की विदा के क्षण! मैथिलीशरण गुप्त ने भी अपने महाकाव्य ‘साकेत’ के नवम सर्ग में घर में रह कर वनवासिनी का जीवन जीती उर्मिला की कहानी कही है. आसन्न विरह के आभास और सीता के वनवास जाने से उत्पन्न हुए कर्त्तव्य के बीच अद्भुत सन्तुलन बनाती हुई उर्मिला… इन चारों बहनों में से सबसे बड़ी सीता तो वन चली गईं . अब बाकी तीनों में उर्मिला ही सबसे बड़ी हैं. तीन सासें तो अपने वैधव्य को भोग रही हैं. उन तीनों सासों की, अपनी दोनों छोटी बहनों की, दोनों देवरों की, और इतने बड़े राजभवन की सम्पूर्ण जिमेवारी अब उर्मिला की हो जाने वाली है. लेकिन इन सब कर्त्तव्यों के बीच उसका अपना आसन्न विरह भी तो है, जिसे न चाह कर भी उर्मिला ने स्वीकार कर लिया है. लेकिन लक्ष्मण के वन जाने के पहले वह एक बार लक्ष्मण से मिल कर अपने को अयोध्या के राजभवन के अपने चौदह वर्षों के वनवास के लिए तैयार कर लेना चाहती है. वह वन-गमन की तैयारी करते लक्ष्मण को बुला भेजती है.

लक्ष्मण एवं उर्मिला दोनों को ही पता है कि उनका यह मिलन एक क्षणिक मिलन-मात्र है। उर्मिला के उलाहनों से प्रारम्भ हुए इस अल्पकालीन मिलन में दोनों में से कोई भी अपने अन्तर के ज्वार भाटे से दूसरे को अवगत नहीं करा पाता है। उन दोनों को ही पता है कि दोनों को अगले चौदह वर्षों का भीषण वियोग सहना है। उर्मिला का उर अश्रुओं से गीला है। लेकिन जाते हुए वह लक्ष्मण को दुःख नहीं देना चाहती… अतः अपनी चपलता को बनाये रखने का असहज सा प्रयास करती है. गरिमा और दीप्ति का आविर्भाव इस बालिका, उर्मिला में अभी होना बाकी है. मायके में माता-पिता, और अयोध्या में सीता के संरक्षण में पली-बढ़ी उर्मिला अभी तक एक चपला बालिका भर ही तो रही है…

अतुल के लक्ष्मण ने ऐसे एकाकी क्षणों के लिये अपनी उर्मिला को ‘मिला’ नाम दिया है. वे आते हैं, और अपनी ‘मिला’ से पूछते हैं, “तुम्हें क्या बात करनी है?”
ये कुछ क्षण आसंग विरह के पूर्वरंग के समान हैं. दोनों ही सोच रहे हैं कि क्या बात करें, कैसे एक-दूसरे से विदा लें. वह भी लक्ष्मण के साथ वन जाना चाहती है, परन्तु उसे पता है कि यह सम्भव नहीं है… उसका विराट कर्त्तव्य उसके सामने नजर आ रहा है.
लेकिन कर्त्तव्य के साथ-साथ उसका अपना विरह भी तो है… एक नन्हा सा, कोमल भावनाओं से भरा हृदय भी तो उसके पास है! यहाँ पर अतुल ने उर्मिला को एक छोटी सी, लगभग नन्हीं सी नवविवाहिता किशोरी के रूप में दिखाया है, चौदह वर्षों का लम्बा विरह जिसके आगे प्रस्तुत होने को ही है! वह कहती है, “मुझे? मुझे क्या बात करनी है?”
लक्ष्मण कहते हैं, “मैं चौदह वर्ष के लिये वन जा रहा हूँ और तुम्हें मुझसे कोई बात नहीं करनी?”
उर्मिला आज इन कुछ पलों में जैसे अपने आने वाले चौदह वर्षों को जी लेना चाहती है, अपने सायास ओलाहनों से बातचीत को सहज करने का प्रयास करती, “तुम्हें भी कहाँ करनी है बात! तुम तो सुनते ही तैयार भी हो गये, जैसे प्रतीक्षा में थे कि कब अवसर आये और तुम मिला से दूर जाओ। मैं बहुत लड़ती हूँ ना तुमसे!”
लक्ष्मण तो ठहरे सदा के गम्भीर! लेकिन अपने कर्तव्यों के बीच उन्हें उर्मिला के उर में समाते जा रहे विरह का भान भी था. वे उस चंचला से बोले, “तुम कहाँ लड़ती हो। कदाचित लड़ने के कारण मैं ही देता हूँ तुमको। अब चौदह वर्ष का समय मिला है तो सोचूँगा कहाँ सुधार हो सकता है।”
दोनों का वार्तालाप चलता रहता है, स्तब्ध बैठे दर्शक सुनते रहते हैं, अपने अश्रुओं को रोकने का असफल प्रयास करते हुए…
लेकिन आसन्न विरह के इस क्षण में उर्मिला उतनी चंचला भी नहीं रह पाती, जिसका प्रयास वह अब तक कर रही थी! वह नन्हीं सी बच्ची, वह चंचला किशोरी अब अपने लक्ष्मण को उपदेश दे रही है, “… आज मुझे लड़ना नहीं है। सुनो, तुम ना… भैया-भाभी की सेवा में, कुछ अपना ध्यान भी रख लेना। खिला के भैया-भाभी को कुछ अपने नाम भी रख लेना। समय पे उठना, समय पे खाना, उल्टी करवट मत सोना। याद मेरी आ भी जाये, भैया के आगे मत रोना।”
‘उल्टी करवट मत सोना…’ उस दिशा में शैया पर उर्मिला होती थी! अब जब वह वहाँ नहीं होगी, तो लक्ष्मण को अपनी मिला की याद आयेगी, उन्हें सन्ताप होगा! अपने विरह से बड़ा उस मानिनी के लिये है अपने प्रिय के विरह का भान!

लेकिन विरह-सन्ताप के साथ-साथ इस सीता-भगिनी को कर्त्तव्य-बोध भी है! ‘याद मेरी आ भी जाये, भैया के आगे मत रोना।’ अपने व्यक्तिगत सन्ताप के क्षणों में भी कर्त्तव्य-बोध के होने का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है!
दोनों के बीच वार्तालाप सतत प्रवाहमान है. प्रेक्षागृह का वायुमण्डल प्रेक्षकों की निस्तब्ध साँसों और आँखों की नमी से बोझिल होता चला जाता है. लक्ष्मण कहते हैं, “मिला… ना राम को, ना सीता को, ना लक्ष्मण को ये श्राप मिला। यदि सच में मिला किसी को तो उर्मिला को ये वनवास मिला। मिला, तुम महलों में रह कर भी वनवास का जीवन भोगोगी। मोर के संग मोरनी को देखोगी, तो भी रो दोगी। पर आह, दुर्भाग्य। मेरी मिला का वनवास ना वतर्मान याद रखेगा, ना इतिहास। उर्मिला का वनवास कोई याद नहीं रखेगा।”

लेकिन उर्मिला को अपने लक्ष्मण पर अटूट विश्वास है, “झूठ कहते हो, कोई याद रखे या ना रखे, मिला का वनवास, लक्ष्मण याद रखेगा। रखेगा ना।” और फिर दोनों ही अपने को रोक नहीं पाते… संयम के सारे बांध टूट जाते हैं… दोनों गले मिल कर फफक कर रो पड़ते हैं। उर्मिला का लक्ष्मण पर यही अटूट विश्वास बहुत वर्षों के बाद लक्ष्मण को रूपवती राक्षसी सूर्पणखा से दूर रखने में सफल होता है! सावित्री की कथा इतिहास में कितनी बार दोहराई गई है!
नाटक के लेखक, निर्देशक और प्रस्तुतकर्ता अतुल सत्य कौशिक ने अपने नाटक को कथावाचक के फॉर्मेट में तैयार किया है. मंचाग्र में दाहिने हाथ पर कुर्सी पर बैठ कर अतुल पूरी कथा के सूत्र को अपने हाथ में थामे, एक कुशल नाविक की भांति दर्शकों को इस कथा-गंगा की यात्रा करवाते हैं. इस कथा-यात्रा की पतवार हैं नृत्य और सजीव गायन, जिसमें लोक से लेकर शास्त्रीय तक सबका समायोजन अतुल ने किया है. अंजली मुंजाल की अत्यन्त सुन्दर और प्रीतिकर नृत्य-संरचनाओं को सुष्मिता मेहता और साथियों ने कत्थक नृत्य के द्वारा प्रस्तुत किया.

एक घंटे और चालीस मिनट के इस नाटक को अतुल ने केवल तीन कलाकारों सुष्मिता मेहता, अर्जुन सिंह और मेघा माथुर के द्वारा प्रस्तुत किया है, जो दृश्यों के अनुसार विभिन्न चरित्रों को बारी-बारी से निभाते हैं. नाटक के आकर्षण का प्रमुख आधार-स्तम्भ है लतिका जैन का गायन. दूसरा स्तम्भ है नाटक में नृत्यों का प्रयोग. आज हिन्दी रंगमंच में गायन और नृत्य का प्रयोग लगभग समाप्त हो चुका है. कविता, गीत, गानों, गजल इत्यादि के माध्यम से निर्देशक ने विभिन्न भावों और संवेदनाओं को दिखाया है. मैथिल सुहाग-गीत ‘साँवर साँवर सुरतिया तोहार दुलहा, गोरे गोरे लखन … दुलहा’, अवधी के विदाई गीत ‘काहे को ब्याही बिदेस’, रामनिवास जाजू की हिन्दी कविता, और हिन्दी, उर्दू, फारसी, बृजभाषा इत्यादि के एक प्रसिद्ध गीत जेहाल-ए-मिस्कीं इत्यादि को प्रयोग करके अतुल ने आज के समय में एक साहसिक प्रयोग किया है… जिसकी बानगी हमने बापी बोस के नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ में भी देखी थी. कुछ लोग इस नाटक को डांस-ड्रामा या नृत्य-नाटिका का नाम देंगे. मैं इस प्रकार के पश्चिमी वर्गीकरण के विरुद्ध हूँ… हमारे नाट्यशास्त्र में कलाओं को एक समग्र तरीके से देखने का प्रावधान है, ना कि उन्हें एक-दूसरे से अलग करके देखने का, जो मुझे ज्यादा उचित लगता है. अतुल के सैट की परिकल्पना में भी कहीं अल्पना जैसी पारम्परिक शैलियों की झलक मिलती है.

नाटक में प्रकाश-व्यवस्था तरुण डांग ने और ध्वनि-व्यवस्था दीप्ति ग्रोवर ने सम्भाली थी. संगीत निर्देशन अनिक शर्मा का रहा. गायन जीवन्त था, लेकिन संगीत कराओके था, क्योंकि, ‘संगीतकारों को साथ लेकर चलना सम्भव नहीं हो पाता!’, अतुल कहते हैं. हिन्दी रंगमंच की यही विडम्बना है, कि एक प्रस्तोता को कितने ही समझौते करने पड़ते हैं!




T20 TEAM INDIA MIGHT GET A SEPARATE DIRECTOR – Any Guesses?

By Sunil Sarpal

According to a report in The Telegraph, BCCI feels that the load to manage multiple formats is too overwhelming for a single Coach like Rahul Dravid. There is a speculation that BCCI might split the coaching roles three ways and the issue could come up for discussion during the apex council meeting later this month.  Biggest curiosity is ofcourse about the T20 FORMAT coach

Rumours are strong about one possibility. Guess who? Perhaps every child in India knows his name – MS Dhoni. Such is his charisma in Indian Cricket. He is tagged as the coolest captain to ever grace Team India.

Captain Cool

For this prestigious assignment to captain Team India, the script was written by none other than Sachin Tendulkar when he recommended Dhoni’s name to the then BCCI President Sharad Pawar for captain material.

His attributes include his unique ability to read the game-situation, pitch-behaviour and team combinations which always bring laurels to the nation.

His timely guidance behind the stumps to bowlers was a treat to watch, so was his uncanny ability to go for DRS. These are some of the talents developed by him to turn him into an iconic figure. His timely bowling changes and field placements made him a street-smart thinker of the game. Dhoni was such a talent that he could enter Team India single-handedly on the basis of being a wicket keeper, or a batsman or just as a captain.

Dhoni was so agile and fitness personified that he used to run between the wickets as fast as anybody. Dhoni’s body was so strong that he could hit a six at will. He was recognised for his ‘helicopter shot’. Dhoni often lifted the morale of the team when the game-situation was slipping away from its grasp. Dhoni was so cool and calculating, that he could change the nature of the game with his determination and could ‘weather the storm’. He was truly a game-changer, and takes the game away from the jaws of defeat.

After suddenly retiring from the game and handing over the reign to Kohli, he was just cooling his heels and playing only IPL, representing CSK.

In the just concluded ICC T-20 World Cup at Australia where India’s ignominious defeat in semis, BCCI new President Roger Binny is reported to have decided that Dhoni should be made Team India Director. Along with the Coach Rahul Dravid, India needs to re-build the team with young legs.

Dhoni’s possible appointment as Director, Team India T20, could lift the morale of the team. Dhoni will build a team on the lines – horses for courses. His uncanny ability to yield the best from a player will take Team India shining once again on the world stage.




What is reverse swing in fast bowling and … what is….?

What is reverse swing in fast bowling by Sunil Sarpal

Ans. When there is dew in the air, because of which, the outfield becomes wet and the ball tends to get wet too. The seam in the middle of the ball separates the ball on two sides. One side of the ball is kept shiny by rubbing and the other side kept wet or as it is. When delivered, the ball tends to drift towards the wet side even though the seam movement is kept in the opposite direction. Thus the movement of the ball becomes the undoing for the batters.

Here are a few more questions answered with what is a…

YORKER

Yorker is a very difficult delivery to pick.  It is bowled by fast bowler with such precision that it lands under the toe of the batsman’s bat.  Those fast bowlers they swing the ball in the air, bowl swinging Yorkers.  Waqar Yunis of Pakistan was one such player who exhibits this art to perfection.  He was called toe crusher.   Because of providing late in-swing in the air, the batsman is bumboozeled and in the process lose direction of the ball.  Instead of hitting the bat, the ball hits the toe of the foot and inflicts damage.  

BEAMER

Beamer is an illegal delivery.  When a fast-bowler bowls a delivery which lands above waist height of the batsman, it is called Beamer.  Firstly, umpire rules out such a ball as no-ball.   Since such delivery can inflict damage to the batsman, the umpire warns the bowler for repeating such a delivery.  If the bowler still persist with such a delivery, then he can be banned from playing and penalised with a fine too.

BOUNCER

To bowl a bouncer, the fast-bowler keeps the length of the delivery short, using his shoulder strength and digs the ball hard on the pitch.  Generally, bouncer after pitching jumps above shoulder height and becomes unplayable unless the batsman is equipped to hook or pull the ball.  Bouncers is also delivered with varying speed of the ball to dodge the batsman so that he mis-times the shot.  

OFF-SPIN AND LEG-SPIN

Both off-spin and leg-spin can be bowled with the help of either fingers or wrist.  When the slow-bowler gives more air to the ball, it automatically spins more.  And if the trajectory of the delivery is kept low, the ball spins less.  Now-a-days, the slow bowlers have learned the art of spinning wrong ones.  The off-spinner can bowl leg-spin by the magic of his fingers and vice-versa.  




Why India lost the World Cup semi-final to England

Sunil Sarpal analyses the 2022 ICC T20 World Cup – semi-final between England and India

Jos Buttler leads England to victory

England beat India comprehensively in the semis. England won the toss and decided to make first use of the ball.

After the match, Kapil Dev very rightly pointed out that Indians are chokers. (Although this tag was originally awarded to the South African team in 1991)

Before the start of the match, Sunil Gavaskar made a valid point – that Indians chase better than setting a target.

I personally attributed India’s defeat to ‘Law of Averages’ over any other pointer. One bad day in office and India is out of the ICC World Cup.

There are some valid questions on the selection of the side.

1) What is the utility of Axar Patel in the side? Does he fit into T-20 side, if yes, then on what basis – batting or bowling or in the category of being a bits and pieces player? He is neither a free flowing batsman, nor does he spin the ball judiciously.

2) What is Ashwin’s contribution in the side? Batsmen hit him for sixers at will. He is effective only on turning tracks.

3) Rohit Sharma being the captain of the side, performed little in terms of batting. How can a non-performing captain lead from the front?

4) In this match, both Bhuvi and Arshdeep were not disciplined in line and length and gave room invariably to batsmen to play freely.

England Captain Buttler, once settled, scored heaps of runs and India did not have the arsenal to get his scalp.

Indians batted poorly during first 6 overs and scored only 36 runs for the loss of KL Rahul. Another noticeable fact is, that Kohli does not score as quickly as Hardik or Surya K Yadav.

Making a mockery of Kartik vs Pant selection does not leave a good taste and is not a healthy sign for their confidence. As if this is a musical chairs game for them.

One more selection error, if not made, could have strengthened Indian batting. It was the non-inclusion of specialist batsman Hooda in place of bits and pieces Axar Patel.

In a nut-shell, India lost the match because of its own selection errors.




अब पितृ दिवस मेरा सूना है। – ज़िले सिंह

पिता तो मेरे चले गए,
अब पितृ दिवस मेरा सूना है।
जैसे लोभी का धन लुट गया,
और लगा मोटा चूना है।
अब यादों में रहे शेष बस,
मूरत नहीं दिखाई देती।
कहां ठहाका रहा हंसी का,
खुशियां नहीं दिखाई देती।
कहां छुपी वो आशीषें जो,
हमको सदां दिया करते थे।
हमारी खुशियों में खुश थे,
और दुख में सदां दुखी दिखते थे।
थे निश्छल, निष्कपट भाव वो,
ऐसा कोई कहां मिलता है।
रिश्तों में स्वारथ सधता है,
और मनों में छल पलता है।
मेरे पिता तो, देवलोक की,
सीधी ऐक निशानी थे।
हुंकारों से रोम खड़े हो,
ऐसे वो लासानी थे।
मगर वो माली चला गया,
जहां बाग पल्लवित होते थे।
क्या मजाल कोई घर में आये,
खुल्लम खुल्ला सोते थे।
पिता गये,वो रति गयी जो,
उनके होने पर होती।
आज अगर जिन्दा होते तो,
ऐसी गति नहीं होती।
जिनकी कोई औकात नहीं,
मुझ पर आरोप लगाते हैं।
गले लगाते रहे मगर वो,
छूट छूट कर जाते हैं।
मेरे पिता ने मुझसे जो चाहा,
वो मैं कर जाऊंगा।
सब रुठे फिर भी मैं अपना,
वचन निभाकर जाऊंगा।
मेरे पिता हैं, मैं भी पिता हूं,
ये धारा है जीवन की।
मैं भी पुत्र हूं,मेरा पुत्र है,
यही व्यवस्था हर तन की।
जहां देने का भाव रहे,
बस पिता वही कहलाता है।
जहां सेवा का भाव रहे,
बस पुत्र वही कहलाता है।
फिर कहता हूं दुनिया में कोई,
मेरे पिता सा पिता नहीं।
मुझे भाग्य से मिले पिता,
मेरी थी औकात नहीं।
मैं उनके गुण क्या लिक्खू,
वो लिखने में नहीं आयेंगे।
राई से क्या पहाड़ तुलेगा,
तोल तोल मर जाएंगे।
है ईश्वर से एक निवेदन,
पुण्य अगर कोई बाकी हो,
फिर से पिता बने मेरे,
दीदार वही, वही झांकी हो।

श्री लालाराम यादव( पितृ दिवस पर सादर समर्पित जिले सिंह )

सबके बस की बात नहीं है।

फूल छोड़ कर कांटे चुनले,
सबके बस की बात नहीं है।
महल छोड के वन को चुन लें,
ये सब की औकात नहीं है।
भावों का भी एक जगत है,
जो लौकिक में नहीं समाता,
द्रष्टि से भी परे दृष्य़ है,
जो आंखों में नहीं समाता।
उसको जो कोई देख सके
ये सबके बस की बात नहीं है।
महल छोड़ कर….
शब्दों का छोटा सा दायरा,
पकड़ पकड़ के कहां पकड़ोगे,
बुद्ध और महावीर की वाणी,
शब्दों से कैसे पकड़ोगे।
जहां शब्दों की पकड़ छूट जाये,
उसको तुम कैसे पकड़ोगे।
सुधा छोडके गरल को पीना,
सबके बस की बात नहीं है।
महल छोड़ कर…
मानव यूं मानव नहीं होता,
जैसे सब मानव होते हैं।
मानवता जिनके अन्दर हो,
वो मानव थोड़े होते हैं।
जो मानव मानव बन जाये,
ये सब की औकात नहीं है।
महल छोड़ कर…
अन्धो को कैसे समझाए,
वेद व्यास भी हार गए हैं।
जीते जागते कृष्ण न दीखे,
सब कौरव बेकार गये है
सबकी झोली में आ जाये,
ये ऐसी सौगात नहीं है।
महल छोड़ कर…
कविता गढ़ दूं, और मैं गा दूं,
फिर भी इससे क्या होता है।
गीता और रामायण लिख दी,
फिर भी अपना मन सोता है।
दर दर पर जो लुट जाये,
ये ऐसी खैरात नहीं है।
महल छोड़ कर…
अंतस का जब भाग्य उदय हो,
और संगत परवान चढे तो,
कभी पुण्य का उदय होय तो,
और सज्जन सत्कार बढ़े तो।
तभी ज्ञान की वर्षा होगी,
ऐसी फिर बरसात नहीं है। फूल छोड़ कर कांटे चुन लें,
सबके बस की बात नहीं है।
महल छोड़ कर …

देखो ये कैसी मजबूरी

दीपक की ये मजबूरी है,
जले नहीं तो और करें क्या।
और पतंगें की मजबूरी,
जान के जल गया और करें क्या।
मजबूरी ऐसी ब्याधा है,
इसको बस मजबूर ही जाने।
क्ई बार मजबूरी में तो,
खुद को पड़ते प्राण गंवाने।
फिर भी हल नहीं हुई समस्या,
देखो ये कैसी मजबूरी।
वो न कभी जान पायेगा,
जिसने नहीं देखी मजबूरी।।
आत्मघात सस्ता होता हो,
मर न सके वो है मजबूरी।
पर ये सब मजबूर ही जाने,
जना न सके ये है मजबूरी।
घोर कष्ट देना मालिक,
पर मत देना ऐसी मजबूरी।
सीता जैसी नारि त्याग दी,
बनी राम की वो मजबूरी।
राम त्याग दिए दसरथजी ने,
जानो थी कैसी मजबूरी।
प्राण त्याग देते सस्ता था,
पर नहीं त्यागे थी मजबूरी।
नारद,शेष, महेश,जिन्हें,
दिन रात रटे,करते मजदूरी,
उनका घर से देश निकाला,
दसरथ की कैसी मजबूरी।
राम तो बड़े उदाहरण है,
पर बड़ी बहुत होती मजबूरी।
जहां समझ और ज्ञान हार जाये,
वो देखी हमने मजबूरी।
मेरा अपना ऐसा अनुभव,
मेरी भी अपनी मजबूरी।
धर्म ध्वजों के ऊपर ही,
हावी होती देखी मजबूरी।
मगर धर्म का साधक ही,
होता मजबूर,यही मजबूरी।
अधम और नीचो की देखो,
नहीं होती कोई मजबूरी।
मैं कहता हूं मजबूरी में,
यों मजबूर कभी मत होना,
धर्म डुबो दो मजबूरी में
ऐसी नहीं होती मजबूरी।
पुत्र कटे,धन दौलत लुट गई,
ऐसी भी होती मजबूरी,
मगर धर्म को लील जाये जो,
ऐसी नहीं होती मजबूरी।
विश्वासो को लील जाए जो,
ऐसी भी होती मजबूरी,
मगर धर्म को लील जाए जो,
ऐसी नहीं होती मजबूरी

फिर ये नूतन,नूतन कैसा है?

सब नूतन होय पुरातन तो,
फिर ये नूतन,नूतन कैसा है।
आज़ का नूतन,कल पुरातन,
भ्रम का एक फंदा जैसा है।
युगों युगों से सभी पुरातन,
नूतन देह बदलते आये।।
आशा और सपनों के सपने,
हमको सदां दिखाते आये।।
पर मानव का मन ऐसा है,
सपने में ही सुख पाता है।।
और पुरानी दीवारों पर,
रंग रोगन करता जाता है।।
नया पुराना कुछ नहीं होता,
जो जैसा है,बस वैसा है।।
एक मिलन है एक विदाई,
पर सब वैसा का वैसा है।।
जिसमें तुम्हें शकुन मिलता हो,
देता हूं नव वर्ष बधाई।।
मंगलमय जीवन हो सबका,
और पुण्य की बढ़े कमाई।।
रहे निरोगी काया सबकी,
मात पिता की हो सिवकाई।
परिवारों में मेल बना रहे,
बहिनें सदां सुहागिन होवें।।
आज्ञाकारी पुत्र सुखी हो,
पुत्री सदां चहकती होवें।।
सुन्दर नारि सदां सुख पावें,
शाकाहार बने सब घर में।।
भारत वर्ष महान बने,
जिसका परचम फहरे अम्बर में।।

(जिले सिंह)

ये जीवन आना जाना है।

ये जीवन आना जाना है।
आज यहां कल जायेगा।।
सूरज चांद सितारे सबको,
काल एक दिन खायेगा।।
धरती से अम्बर तक देखो,
एक ही चीज सनातन है।
सच्चे गुरु का ज्ञान अमर है,
तुझे अमर कर जायेगा।।

कभी बने जो राजमहल थे,
आज बने खण्डर देखो ।
जहां अप्सरा नृत्य करे थी,
अब उसका मंजर देखो।।
क्षण क्षण सोना मिट्टी होता,
मिट्टी सोना होती है।।
इतनी बात समझ में आये,
तो फिर जीवन बदलेगा।।
सच्चे गुरु….
एक धुरी है एक चाक है,
ऐसा सबका जीवन है।।
सभी चाक पर घूम रहे हैं,
चाक बना जीवन धन है।।
सन्त धुरी को देख रहे हैं,
पल पल पैनी नजरों से।
और अज्ञानी चाक देखता,
घूम घूम मर जायेगा।।
सच्चे गुरु..
नित्य सदां रहता दुनिया में,
और सदां रह जायेगा।‌।
लाख संभालो सपने को तुम,
पर सच नहीं बन पायेगा।।
जान के बन्दे गोता खाये,
ये ही तो भव सागर है,
बाहर निकल जा जैसे तैसे,
सौने का हो जायेगा।।
सच्चे गुरु..

कवि ज़िले सिंह, Delhi Police. (Studied in MSJ College, Bharatpur)



Torii Gateway and Enclosure – Dark Secrets /Archana Hebbar Colquhoun

The murder of Naina Sahni – shot dead by her husband and her body stuffed in a tandoor oven to be burnt to cinder at an upmarket restaurant in New Delhi coincided with my exhibition of Torii sculptures and paintings at the LTG gallery in June 1995.

The principal installation of a Torii gateway in this exhibition was made using wooden planks that were coated with a clay and straw mixture. The Torii structure was erected with supports of low brickwork walls arranged in the form of a courtyard of a traditional Indian home. The brick structure contained within its walls mini gateways made of two bricks placed upright with one horizontal brick placed across at the top, to create little entryways.

At the start of designing the installation, I had originally planned to place in the courtyard space a collection of moulded objects that acted as signifiers or markers of early human history.

This idea of attempting to depict the history of civilization suddenly gave way when I heard of a horrific “Breaking News” item of the Tandoor Murder case just as I was working on the installation.

After I heard the news, my work changed – the structure remained more or less the same as initially planned – but the contents that were to be placed in the courtyard were replaced by objects such as charred remains of coconut shells, other burnt articles, and a full head of a woman’s hair as if yanked in one stroke and flung at the foot of the Torii gateway.

The uploaded image shown below is a doctored one with two images of the same work almost mirroring each other. When the main Torii work was created in the gallery as an installation I had titled it “Boundaries of Experience.” Broadly speaking, the title still holds even after the intrusion – into my work in progress – of an unrelated subject that of a gruesome murder that took place at a walking distance from the gallery.

An important lesson I learnt from doing this show was that when an idea starts to take the shape as an art object a dynamic, external entity may completely hijack your carefully planned art work.

https://en.wikipedia.org/wiki/Murder_of_Naina_Sahni

The original title of the work was “Boundaries of Experiences”




Surrealism as the means of escape in Girish Karnad’s Hayavadana and Naga-Mandala

It is very easy to remain in the pragmatic world of apparent realities. Seeing is believing but if this were the ultimate truth, people would never have felt the need to escape the bondage of the so called empirical reality and plunge into a land of possibilities which does not comply with the parameters of tangible realism and yet has immense possibilities of excavating the depths of inner human psyche within which lies the unadulterated truth of their lives. What is the reason for the real world often becoming fake when it comes to projecting human conscience? It is because reality occludes people from presenting themselves as they are with their personal beliefs founded on unconventional notions that more often than not disregard the fundamental principles of propriety or righteous behaviour assigned to them. Girish Karnad’s plays Hayavadana and Naga-Mandala explore deep recesses of human conscience that often remained unexplored by practical human efforts.

In Hayavadana, Padmini’s secret desire is that she wants a man with a sound brain and a good physique instead of a weakly built Devadatta, her husband. In Naga-Mandala, Rani’s secret desire is that she desires a loving man in her life instead of the tyrant husband she has in reality. Both these heroines are essentially tabooed by the society from expressing their wants openly and they are intelligent enough to comprehend the fact that crossing the boundaries of morality for them both would typify them as adulteresses. It is therefore that another world altogether different from the real one is recreated by both these women in which their desires are met, rather subtly but conspicuously. Moreover, despite the fact that they manage to fulfil their wants, they aren’t stereotyped as illicit or wrong in their conduct. This is the speciality of their created worlds that are far removed from the realistic life.

Padmini’s world includes Kali, the goddess who wakes up suddenly from her sleep and grants her the incredible boon of a man with brain and brawn. This is actually impossible in reality. Nonetheless, when we read the play or watch it, we accept this improbability whole heartedly as we are somewhere aware that the deliberate use of surrealistic setting acts as an apt device to counter our expectations of a ‘good Indian woman’ who is known for her strong ethical values. When Kali makes an impossible phenomenon a reality with her trick Padmini does not have two men but has only one man with two distinct qualities of two men. This apparently magical reality is accepted readily by the us because we are indoctrinated so strongly to accept anomaly in imagination but not in our reality. It is therefore that educated readers and audiences of the play do not dismiss the story as absurd or unreal because there is no need for providing any official approval to the heroine for her conduct of desiring intelligent Devadattta and the able bodied Kapila as she has them both in one man because of a divine intervention. We are practically saved, I would say, from the onus of giving our opinions on the legitimacy of the choice. Similarly, when Rani makes love to a serpent disguised as her own husband in Naga-Mandala, we are absolutely free from being judgmental about her in any sense of the word. Rani is shown as an innocent village girl who hardly has the calibre to deduce the reality of the man who appears to her every night in the guise of her husband. It is so comfortable for the proponents of morality to convince themselves that Rani is to be acquitted from the blame of fornication. Thus, surreal acts as the device of escaping reality that is stringent and demands an absolute insistence on ethical conduct. While we know that Rani has a tyrant husband who does not love her and the serpent has brought a lot of love to her, we cannot apparently approve this extra-marital relationship of her. Nevertheless, it becomes a lot easier to bypass the illicit element in the relation of the two if we accept the imaginary folk tale of the serpent lover as true.

The point here is, not only does surreal drama acquits the protagonists from the blame of disloyalty; it relaxes the recipients from the cumbersome task of giving an honest verdict for the two. As soon as the readers/audiences are released from this requirement, there germinates a whole range of viewpoints in relation to both these characters that are far removed from the idea of stringent categorization of good or bad. This is what the playwright Girish Karnad intends to execute in both these plays. He seems to provide us the luxury of freely interpreting Padmini and Rani as victims of patriarchy or shrewd creators of their own desired reality. Ultimately, this dual interpretation dismantles conventional bigotry in a very intelligent way without dismissing the ethical notions value education we study in our lives. Karnad does not undermine ethics and morals; he dislodges the fetish for these that often we have in our lives. In addition to this, he gives those the emancipation to liberate themselves from these notions completely who feel that they do not require them at all and their life is a personal matter in all its entirety. Thus, both these characters expose our expectations for an orderly social living as well as our keen desire to break the set concepts of ‘morally correct’. There is a Padmini and a Rani in all our lives who don’t want to comply with the rules but our reluctance to accept them in public is also a matter of perception in these plays. If we secretly support extra marital alliance, why don’t we have the courage to voice our feelings out in the open? Why do we have to have double standards in our lives promulgating loyalty in marriage on the one hand and carrying on a tacit affair on the other? Our perspectives of modernity are also challenged in the plays through the use of the surreal. We want the surreal as a means to escape reality of our misbalanced living that is both conventional and anomalous at the same time. Only surreal can divulge these inner secrets and can be digested by the people today who superficially cling either to their culture or to unconventional ways of living. If Padmini and Rani were vocal enough to claim their likings, am sure people would have then(when these plays were published) and even today would have comfortably judged them as wrong. At the same time, it would have been done by the same people whose notions of ethics and propriety and very vague and far from being culturally sound. Unlike these people, those that cling to ethics strongly would have completely dismissed both these characters as inappropriate in their desires. Surreal prevents both these extremes and gives us thankfully some space to think and decide which school of thought would we like to belong to – the ethical or the modern and how.

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Is Ethical teaching to students possible in the modern pragmatic times?

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Teaching is not just a method. It is a principle forming ethical code of conduct that students and teachers are inevitably required to retain in order that education becomes something more than just a curriculum driven enterprise. Today, times have changed and so has the value system being reformed which makes it quite interesting and challenging to balance the rightful morals and the modern alternatives on the part of both students and teachers. To adequately select the kind of valuable precepts to be followed and those to be accurately negated for the higher good of futuristic learning which is far from being simply a matter of ‘obeying the fixed norms set by authorities is indeed an intricate choice to make.

The present day has shown us the theory of relativism which operates on the notions that ‘good’ and ‘bad’ are mere perspectives and there isn’t a hard and fast rule behind following or rejecting certain behavioural codes; the academic sector also not being excluded from the same. We know we have many who seem to be confused whether rules are meant to be followed or broken. That’s the tragedy of the modern times that we aren’t able to draw a visible and clear line between the dos and the don’ts in our lives. Consequently, we all try ways and means to adjust ourselves the way we can without being bothered about being essentially – ‘ethically’ correct. There isn’t anyone who could be straightaway blamed for the circumstances that have resulted on account of the modern man’s own lethargy of finding out the adequate distinctions between morally correct and incorrect. All we can do is simply state that the times have changed and so we need to accommodate ourselves with the altering times wherein teachers and students may take certain deviations from the stringent norms of maintaining a conventional –Guru-Shishya, Teacher-disciple relationship. It can be based on camaraderie rather than a pedagogic alliance between the two and the one who teaches and the one who learns both can be on the same platform; each learning from the other. There isn’t any harm of course in accepting this fact for this is the truth of today’s era that encourages equitable learning which rests on the principle of non-discriminatory teaching enterprise wherein the teachers act as mentors and facilitators providing the best of their knowledge and at the same time remain receptive towards accepting the points of view of their mentees.

Apparently, this is healthy and seems oriented towards eradicating orthopraxy wherein the teachers dwell on the notions of stringent dominion and the students hardly get a chance to ask questions or engage in any healthy discussion that could enliven the concept of education as a holistic learning approach. In such an overtly adequate environment, it seems rather inconsequential to demarcate the teachers and the students as seniors and juniors or experienced and novice etc. These terms that are viewed as derogatory by those that regularly endorse teaching as the means of effacing teacher student difference and making the teacher an approachable entity rather than a formidable personality. Nonetheless, as the thin line of difference has been blurred, it now becomes very difficult to justifiably present the requisite of the need to treat teaching as a respectable profession and teacher as the one that deservedly ought to be revered for the contribution that one makes in the field of imparting education. The repercussions of this phenomenon are such that neither the teacher nor the student and not even the parents of the respective students are able to offer an appropriate wisdom on how teachers and students should be when they are in an academic setting. In addition to this there seems absentia of guidelines in the matter of interactions between teacher and student in the external environment outside the school.

It is under the pretext of being ‘modern’ educationists that teachers today at times dismiss the mandate of being ‘obeyed’ irrespective of the child becoming assertive or demanding or even at times irreverent in one’s demeanour. Ignoring under the guise of being receptive towards informal approach of the students in order to make them feel comfortable in one’s presence seems simply an excuse. It is universally acknowledged that a teacher ought to let one’s students understand that a certain code of conduct is supposed to be followed when one chooses to interact with an elderly and experienced mentor. A student often escapes the guilt of being impertinent with the teacher on account of one’s tender age wherein immature language lapse and unregulated mannerisms are labelled as juvenile misdemeanours. A teacher on the other hand is responsible for the mistake a student makes while taking the self-respect of the mentor for granted.

Teaching is just not disseminating the information contained in the books. It is the onus on the teacher of ‘shaping characters’. This process is not only serious but also challenging. Not all the students are open-minded towards the process of ‘ethical guidance’. It therefore becomes inevitable for a teacher to identify the mental readiness of each student towards adopting what we term as ‘good manners’. Moreover, the difficulty is also on account of the fact that the contemporary society is heavily oriented towards promulgating the notions of pragmatism which unfortunately dispense with the requirement of including ethical values and principles of life. It is erroneously proclaimed by many so called modernists that being sensitized towards cultivating humanitarian virtues founded on the principle of emotions is a sign of weakness. Those people that get influenced by such misconceptions become hard hearted and focus only on attaining material success. That pragmatism is the only need of the present day and emotional thinking is a waste of time and energy is the most convenient theory adopted today. This is generally the belief of those that perhaps do not comprehend the rationality of being modest and courteous without which apparently there is no chance of establishing a healthy human society. Since the minds of the children are so impressionistic, they are the ones that get misguided by such wrong concepts and because they do not know the difference between being practical and being insensitive, these two concepts overlap and shape the deformed personality of many as we see them today.

Teachers have an integral role to play in this regard and even parents need to extend their support in the establishment of value education as a priority. Opted by many academic institutions these days, it is indeed beneficial to have a course on righteous conduct that may enable the children understand the worthiness of being ethical in their attitude. Together with the students, today’s teachers also need to undergo a vigorous training on retention of ethical virtues. Ensuring equity in their approach towards students that effaces distinctions of any kind based on either their academic progress report or their social stature is fundamental. Practicing the principles endorsed to the students in one’s own life is another mandate that the teachers indispensably need to follow in order that the students develop respect for them; respect cannot be demanded, it is to be commanded is a well-known adage. Thus, value education is not to be myopically understood as another subject to be taught to the students. It is something that is ought to become a regular habit inculcated in the lives of the teachers first and then through them in the lives of the students in order to have clarity that we all strive hard today to achieve about the goal of the teaching profession.

It is very easy to state that the child is beyond control or discipline is not possible to be imposed as a rule in today’s high-tech secular environment wherein students are smarter and more informed than the teachers as they are exposed to the techno-savvy world. The fact is that corrective measures are the right granted to every teacher and they need to be adopted as the means to bring about the change in the misinformed students that have been wrongly manipulated towards the ideas of liberty and secularism. The goal is achievable and is not something that is too far-fetched or larger than life to be experienced as a reality in our lives. Let us as teachers try our level best to strike a balance between ethical values and modern pragmatic concerns that demand constructive alternatives in the existing traditional systems of education. This balance is the adequate mode of making teaching something more than just a mundane exercise carried out as a professional endeavour offering lucrative benefits. The day when teacher learns to make learning a holistic experience for a student and selflessly impart education retaining ethical values, this world will certainly have better citizens committed towards living a virtuous life. The teacher student relationship will definitely be exemplary of an amicable affinity between a true mentor and a responsible mentee.

For comments if any please send in the box below.